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सोमवार, 12 सितंबर 2011

आतंकवाद

बम का धमाका करना, आतंक फैलाना 
कितना आसन लगता है, हमारे नौजवानों को 
उपर बैठे उनके आका, पथ-भ्रष्ट करते इंसानों को
कितनी मांगें होती हैं सुनी, कितनी कोख उजडती 
ये रत्ती भर भी न होता है, गुमा उन बदमाशो को 
रोते- कलपते अनाथ बच्चे, अपनों को खोने का गम
हिला भी न पाता है, आत्मा और जमीर हैवानो का 
कभी भी न सोच पाते, ना ही सोच पाएंगे ये बेदर्द दरिन्दे 
इन्सान कहना भी इंसानियत की बेइज्जती करना होगा,
इन बहशियो को 
इन खूनी आतंकिओं की ना है कोई ,जात ना है बिरादरी 
ना है कोई अपना, ना माँ -बाप ना ही कोई रिश्तेदार 
इन्होने तो बस आतंक, बम, हत्या, खून से ही कर ली है नातेदारी 
अरे, बेबकूफ कभी तो बनाकर देखते किसी को अपना 
कुछ भी ना याद आता, भूल जाते कहर वरपाना-गर बना लेते सबको अपना ? 
ना होता कहर इतना, गर देखते वो भी सुंदर सपना, और किसी को कहते वो भी अपना ?