Roshi
शुक्रवार, 25 मई 2012
Roshi: कभी कभी अतीत चिपक जाता है कुछ यु जैसे हो परछाइशारी...
Roshi: कभी कभी अतीत चिपक जाता है कुछ यु जैसे हो परछाइशारी...: कभी कभी अतीत चिपक जाता है कुछ यु जैसे हो परछाइ शारीर से घुलमिल जाता है यु जैसे हो पेटजाई चाहकर भी ना पीछा छुडा सकते हैं हम उससे ढोन...
बृहस्पतिवार, 24 मई 2012
Roshi: बिसर गए वो दिन जब सब भाई बहिन होते थे इकट्ठा सुबह ...
Roshi: बिसर गए वो दिन जब सब भाई बहिन होते थे इकट्ठा सुबह ...: बिसर गए वो दिन जब सब भाई बहिन होते थे इकट्ठा सुबह से होता था जी भरकर उधम ,और हंसीठठठा ना कोई था समर कैंमप ,ना था होम वर्क का टनटा द...
बिसर गए वो दिन जब सब भाई बहिन होते थे इकट्ठा
सुबह से होता था जी भरकर उधम ,और हंसीठठठा
ना कोई था समर कैंमप ,ना था होम वर्क का टनटा
दिन भर थी बस हंसी -ठिठोली और था बस मस्ती का फनडा
कहाँ गए वो दिन ,वो खिलखिलाहटों से चहकते घर आँगन
सब कुछ भुला दिया इस जीवन की आपाधापी ने दिन -प्रति दिन
काश हम लौटा लौटा पाते न न्हे नौनिहालो का मासूम बचपन
जहाँ घुमते वो निर्द्वंद ,लेते भरपूर छुट्टी का वो भरपूर आनंद
बर्फ का गोला .चुस्की और कच्ची कैरी के चटकारे बड़ा देते जीवन का रंग
कभी जाते थे छत पर ,और सोते थे खुली हवा में लेकर मेच्चर्दानी का आनंद
पर अब तो हो गयी सब भूली -बिसरी बातें और ना रहे वो आनंद
बुधवार, 23 मई 2012
Roshi: देखा आज एक पूर्ण पल्लवित पलाश का एक वृक्ष अपने पूर...
Roshi: देखा आज एक पूर्ण पल्लवित पलाश का एक वृक्ष अपने पूर...: देखा आज एक पूर्ण पल्लवित पलाश का एक वृक्ष अपने पूरे यौवन ,पूरे शबाब के साथ खड़ा था वो अपनी पूर्ण विकसित शाखों को यूँ फेलाए था वो ज...
देखा आज एक पूर्ण पल्लवित पलाश का एक वृक्ष
अपने पूरे यौवन ,पूरे शबाब के साथ खड़ा था वो
अपनी पूर्ण विकसित शाखों को यूँ फेलाए था वो
जैसे लेने को आतुर हो प्रेयसी को अपनी बाँहों में
तन पर लपेटे था वो पीत वसन की चादर चहुँ ओर
रिझा रहा था वो अपने पीले पुष्प गिराकर अपनी प्रेयसी को
हर कोशिश थी उसकी भरसक प्रेमिका को लुभाने की
कभी देखा है ऐसा निशब्द प्रेमालाप किसी भी प्रेमी का
जो बिन बोले ही सब कुछ कह देता है पूर्न मौन रहकर
शनिवार, 12 मई 2012
Roshi: ना कोई चिट्ठी .ना कोई संदेस पंहुचा सकते हैं हम वंह...
Roshi: ना कोई चिट्ठी .ना कोई संदेस पंहुचा सकते हैं हम वंह...: ना कोई चिट्ठी .ना कोई संदेस पंहुचा सकते हैं हम वंहा चली गयी हो माँ आप हम को छोड़ कर जहाँ रोज़ रोता है दिल ,और तिल तिल-तिल मरते हैं हम य...
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