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सोमवार, 27 दिसंबर 2010

ऐसा क्यो होता है ?

ईश्वर ने दी अनुपम सौगात 
लड़का हो या लड़की पर हमारा मन तो 
खबर सुनते ही उस विधाता पर 
दोषारोपण करने लग जाता है  
ऐसा क्यो होता है ?
बालक बैठने लगा ,चलने लगा 
बुद बुदाने लगा ,बोलने लगा 
मन दूसरे बालकों कि चाल-ढाल से 
तुलना करने लगता है
ऐसा क्यो होता है ?
बालक पाठशाला जाने लगता है 
मन लगातार शाला में ,टीचरों में 
उलझा रहता है दूसरी शाला ,अध्यापक बेहतर 
ऐसा क्यों होता है ?
बालक बोर्ड परीक्षा देता है 
मन लगातार दूसरे बालकों कि तैयारी और पढ़ाई 
हमारे बालक से बेहतर में , उलझा रहता है,
ऐसा क्योँ होता है? 
बालक कॉलेज जाता है  
मन दूसरे बालकों के करियर सर्विस में उलझा रहता है 
ऐसा क्यों होता है ?
बालक के पारिग्रहण का समय आया है 
मन दूसरे वर- बधुओ की तुलना में ही उलझा रहता है 
ऐसा क्योँ होता है ?
नाती- नातिन, पोता- पोती का होता है आगमन 
मन फिर वापिस उसी विधाता पर 
दोषारोपण करने लग जाता है 
ऐसा क्यों होता है ? 

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

दोस्ती

कुछ सुख हर इंसा की किस्मत को नहीं होते नसीब
पर इस सुख का हमने आनन्द  उठाया है भरपूर और खूब
आज जी हमारा चाहा कि हम इसको बाँटें सबसे और खुश हो जाये खूब
वो सुख जो हमको मिला वो है दोस्ती और चला आ रहा बाखूब
हमने तो चाहा इस रिश्ते को दिल से निभाना पर दोस्तों ने इसको निभाया है खूब
हर सुख दुःख, तकलीफ और दर्द हमसे बांटा और राह दिखाई खूब
हर मुश्किल , कमजोरी , परेशनी पर बढाया हाथ, दिया साथ खूब
कई बार दिल था टूटा, माँ का था जब साथ छूटा
यही थे फ़रिश्ते जिन्होंने था संभाला हमको खूब
हम पूछते है आपसे किया यह सुख आपको हुआ है नसीब
अगर नहीं तो कियूं ना आप भी कोशिश करे बनायें अपना नसीब
इस सुख पाने के हैं गुण अनेक :------>>>>

१. न कभी दोस्त की बुराइ करे न सुने.
२. न कभी इसकी उससे ना उसकी इससे कहें 
३. दोस्त को दें अपना दिल बापस ले ले उसके दर्द
४. यह रिश्ता ऊपरवाले  ने बनाया और हमने दोस्ती से निभाया
५. दोस्तों के साथ हर शै , हर वक्त का मजा ले खूब . .

उमंग

उमंग अपने आंगन की 
नव सृजन, नव जीवन , नव आनंद है अपूर्व
कारण है इसके अंतस में समेटे खुश है वो खूब
बालकों का कलरव घर आँगन है खुशियों से पूर्ण
हृदय में है अनेको उमंगें उत्साह और  प्यार सम्पूर्ण
नाती का वो ठुमकना, चलना ,मचलना और इठलाना 
कर राह था वो सबको आनंदित घर आँगन था गुंजरित.
व्यंजनों की चटपटाहट, बर्तनों की खडखडाहट 
रसोई से उडती थी खुशबू और थी बच्चो की सुगबुगाहट 
बर्तनों की खड-खड, सेवको की चिड-चिड और अतिथियों की हर पल आहट
कब होता सूर्योदय और होता था कब अस्त ना थी कुछ खबर ना ही भनक 
मन भरता था कुलाचें और मस्तिस्क बहुत ही व्यस्त 
लगता था जिंदगी यूँ ही चलती रहे, शाश्वत और अनवरत 
समय का चक्र ना कभी रुका है ना ही रुकेगा 
हर पल को जी कर, दामन में समेट कर 
खुशियाँ लुटाकर, संतोष लूटकर
ह्रदय प्रफुल्लित है, आनंदित है हर पल जी कर ...

आन्या की पहली होली

लाडो को मुबारक हो पहली होली
साथ में होगी मम्मी -पापा की ठिठोली 
चाचू और दादी भी रंग खेलें और मुस्कराएँ 
हर्षित मन सबके लें वो ढेरों वलाएं
नानी और बड़े नानू देते हैं ढेरों आशीर्वाद 
लाडली को मन ही मन करते है वो याद 
नानी, मासी ,मामा भेजे होली पर ढेरों प्यार 
फूलो ,फलो और पाओ सबका ढेरों दुलार ..

फागुन की मस्ती

फागुन की मस्ती है तन मन में है छाई
बगियन में कोयल ,कुंजन में बौर है अलसाईं  
नित नवपल्लव  संग ,पुष्पों से बगिया है महकाई 
प्रकृति ने धरा पर पीत पुष्पों की चादर है फहराई
होली खेलें अदिति संग नीरज देखत माँ है हुलसाई
राघव,  अनुभव की मस्ती देख है भावी मुस्काई  
होली की बधाई ,बधाई और ढेरों बधाई )--   

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

Roshi: नारी की व्यथा ?

Roshi: नारी की व्यथा ?: "जीवन के अतीत में झांकने बैठी मै पायी वहां दर्दनाक यादें और रह गयी स्तब्ध मै समूचा अतीत था घोर निराशा और अवसाद में ..."

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

सावन की यादें

प्यारी बिटिया .............
सावन की बदरी में
झूलो की डोरी में
तुम याद बहुत आओगी
             बारिश की फुहारों में
             तृप्त करती बौछारों में
             तुम याद बहुत आओगी
मेहंदी के बूटों में
रंग बिरंगे सूटो में
तुम याद बहुत आओगे
              रंग बिरंगी चुनर में
              लहंगे की घूमर में
              तुम याद बहुत आओगी
मेघो की घन-घन में
पायल की छन-छन में
तुम याद बहुत आओगी
              चमकती बिंदिया में
              छनकती पायलिया में
              तुम याद बहुत आएगी ..................
                                                            माँ ........ 

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

दर्द

माँ का लाडला, उसका अपना कोख जाया
रात को जब ज्वर की मर्मात्मक पीडा से था छटपटाया
सरदर्द, बदनदर्द और थीं अनेको तकलीफे और दर्द 
माँ तो यही समझती रही थी की यह सब कष्ट है उसको
                     रात भर यही समझती रही की उसको हुआ है ज्वर
                    पर ज्वर से तो लाडला था परेशा और हैरान
                    डाक्टर ने बताया की हुआ है उसको डेंगू जो करेगा परेशान
                   घूम गया था मस्तिक, रुक गई थी धड़कन और दिल परेशान
कियूं न हुआ था उसको डेंगू, कियूं किया लाडले को परेशान
 काश मिल जाता वो मच्छर तो पूछती वो छटपटती माँ
तुझको ही कियूं मिला था मेरा वो लाडला , छोटा बच्चा
मै भी तो थी साथ कियूं मुझको तूने छोड़ दिया शैतान
                 असहनीय पीड़ा, दुःख, तकलीफ, कियूं दिया उस बालक को
                 अपने हिस्से का दुःख प्राणी को झेलना ही पड़ता है यकीनन
                माँ को याद आया वो लम्हा जब पड़ी थी उसपर विपदा भारी
               और  छटपटाई थी उसकी भी माँ और यही कष्ट हुआ था तब उसको
अब समझ पाई थी बेटी आज उस तड़प, दर्द  एहसास को
आज यही बताने को नहीं है उसकी माँ उसके पास
शायद यही दर्द, पीड़ा , अहसास चलता रहेगा हर माँ के साथ
 और वो वयां ना कर सकेंगी  अपना दुःख, लाडले के साथ ... .....

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

Roshi: जन्म दिन की शुभ कामना

Roshi: जन्म दिन की शुभ कामना: "पाया है परिवार ने प्रकृति का अनुपम उपहार कर दिया है जिसने हर्षित मन सबके अपार अबोध कलिका से पाया है नवनिर्मल रिश्तों का संसार कलरव है, ध्वनि..."

Roshi: जन्म दिन की शुभ कामना

Roshi: जन्म दिन की शुभ कामना: "पाया है परिवार ने प्रकृति का अनुपम उपहार कर दिया है जिसने हर्षित मन सबके अपार अबोध कलिका से पाया है नवनिर्मल रिश्तों का संसार कलरव है, ध्वनि..."

जन्म दिन की शुभ कामना

AANYA 
पाया है परिवार ने प्रकृति का अनुपम उपहार
कर दिया है जिसने हर्षित मन सबके अपार
अबोध कलिका से पाया है नवनिर्मल रिश्तों का संसार
कलरव है, ध्वनि  है ,स्वर है और है नई पुकार
 मम्मी ,पापा ,दादी नानी बूया ,चाचा नूतन शब्दों कीटंकार
भर दिया है जिसने  सबके मन उमंग ,प्यार और दुलार
दुआएं हैं हमारी फूलो ,फलो और  पाओ सबका प्यार
कल तक थीवह अबोध बालिका अदिति आज है सद्ध  प्रसूता
सफल हुआ है नारीत्व पाकर सुख मातृत्व अनूठा

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

सुबह

सुबह  उठकर ना
जल्दी स्नान  ना ही पूजा,  व्यायाम और न ही ध्यान
सुबह से मन  है व्याकुल और परेशां
कब कहाँ खो गया मन और ध्यान ना थी कोई पेरशानी  न था कोई व्यवधान
मन था निरंतर  विचलित तीव्र गतिमान
सुबह से था कौन किधर न था ध्यान
शायद यह था मौसम और प्रकृति  का तापमान
किया था जिसने हमको निरंतर परेशां
घर भीतर बहार अन्दर था मन चलायमान
बढती गर्मी उमस बाताबरण का था व्यवधान
निरंटर आग उगलते शोले
था कोई नहीं समाधान
इश्वेर ही दे सकता है
अब शीतलता का तापमान
पशु पक्षी नर नारी सभी व्याकुल थे चलायेमान
हे प्रभु कर दो दया भर दो सागर नदी और आसमान
बरसा दो नेह अमृत धरा पर घम घमासान .............

जन्म दिन की शुभ कामना

प्रिये पापा,
जन्म दिन मुबारक हो, साकेत के लौह स्तम्भ को
जन्म दिन मुबारक हो मात्र हीन बेटीयों के पिता को ...
जन्म दिन मुबारक को पित्र हीन नातियों के नानू को
जन्म दिन मुबारक हो पित्रहीन बालक के नानूल को
जन्म दिन मुबारक हो सभी बालको के प्रेरणा स्रोत को
जन्म दिन मुबारक,  मुबारक, मुबारक  हो
इश्वेर आपको शतायु करे .................
आपकी बेटी ...................

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

आशीर्वाद

सखी जो खुद थी कभी नव परणीता ,आज है दुल्हन लाई
खुशियाँ भर निज अंचल में ,उमंग है उसके अंग अंग समाई                                                        
नव उल्लास है चहुँ  ओर, ख़ुशी से वो है न फूली समाई 
बेटे का सेहरा, नव वधु आगमन वर्षो से थी जो आस संजोई 
                                  आ ही गया वो शुभ दिन सखी आज कामना हुई पूरन
                                 जैसा पाया पति संग तुमने लाड -प्यार, इज्जत और सम्मान 
                                 देना सर्वदा बेटे- बहू को वैसा ही दुलार और सम्मान  
                                हँसाना -मुस्कराना, रूठना- मानना , चहकना और खिलखिलाना 
यही है इस पवन रिश्ते की गहराई, इसको यूँ ही निभाना 
हमारी है दुआएं दिलो जान से फूलें- फलें, सपरिवार यह जोड़ी 
'दूधो नहाओ' पूतो फलो' यह आशीर्वाद है बहुत पुराना 
अब तो बस फेसबुक पर मैसेज से है इस जोड़े को समझाना 
मैसेज कब करना है ? बाद में बताएँगे .........................


                                                                         ''शुभ कामनाओ सहित''




























सोमवार, 22 नवंबर 2010

नन्हे महमान

ओ नन्हे मेहमान, तेरे वास्ते हैं हम सब परेशान
तेरी सलामती और सेहत के लिए मन है बेचैन
हर घडी हर पल है नई आशाएं, नए सपने
नए रिश्ते जुड़ने की, सुगबुगाहट, नई कल्पनाये
हर पल बढती है धड़कन दिल की मन होता है, बेचैन
हरदम सोचती हूँ उस प्रसब पीड़ा की वेदना, पर
तत्काल ही आँखों में आ जाती है सूरत उस छोटी जान की
पागल मन डूबने लगता है उसके प्रेम और नई पहचान में ...

नव शिशु आगमन 2

मन बेचैन है, परेशांन है, आकुल है हैरान है
नवागत के आगमन पर उमंगें है उल्लास है
साथ ही मन मैं है भय उस दर्द  का
नव जीवन के आगमन पर होने वाली असहनीय पीड़ा
कैसे सह पायेगी लाडली  उस मर्मान्तक पीड़ा को
मन कांप उठता है हृदय घबरा उढ़ता है नींद जाती है उड़   
रूह कांप जाती है , याद कर माँ की उस पल को
क्या करे ? गुजरी है माँ भी इसी तकलीफ से
और जन्मी थी यही लाडली उसी शरीर से
प्राकर्तिक का यह  नियम चलता रहेगा  इसी तरह
शाश्वत , सदैव , निरंतर और अनवरत .

नव शिशु आगमन 1

नवागत के आगमन से मन है प्रफुल्लित, उत्साहित
निरंतर हूँ करती एहसास उस कोमल स्पंदन का
नर्म है हथेली कोमल तलवा, निरंतर है जो सहलाता
हर घडी, हर शै है यह अहसास दिलाता है मन
की वह यही है, यहीं कहीं है मेरे दिल के आसपास
महसूस करती हूँ उसकी  धड़कन, आवाज उसके रुदन की
टकराती है दिल से और हिला जाती है मेरी रूह को
नर्म, अदभुत, निष्पाप, सुंदर रूप है दिखता स्वप्न में
मुझको उसके कोमल स्पर्श का अहसास देता है, अनमोल सुकून
नींद में जगाती है उसकी अठखेलियाँ, करती है जो नवनित ठिठोलियाँ
कब आयेगा वह नवागत, भर देगा जिंदगी  में नूतन किलकारियां ?

जीवन की राह

कभी कभी जीवन में आ जाते हैं
अचानक ऐसे मोड़
जहाँ पर आप, सिर्फ आप
रह जाते हैं अकेले
घर, परिवार, पिता, बहन सब है आसपास
पर मन है निशब्द, मौन और है मद्विम साँस
भीड़ से दूर, एकांत, शांत, अकेलापन
है पत्तियों की सरसराहट, झींगुरो की आहट
मन को हैं सब यही कुछ लुभाते, बहलाते
और मै इन सबको अपने बीच में पाकर
हूँ अत्यंत खुश और यही है मन लुभाते
कियूँ की यह सब साथ ही हैं जख्मो को सहलाते
फूल, पल्लव, हरियाली यही है मेरा जीवन
नित नव जीवन, यही देता है 'साकेत' का घर आँगन .......

बुधवार, 17 नवंबर 2010

कल्पना

बंद खिड़की का पट खुला
मानो जीवन को मिली नई उडान
क्यूंकि उसका शरीर था निष्क्रिय
उस की कल्पना को मिले नए रंग
अम्बर नीला, बादल सफ़ेद और थे कई रंग
कैसा अम्बर ? कैसे बादल और कैसा इन्द्र धनुष का रंग
सोचता ही रहा , इतने बरसो से लेता हुआ और सक्रिय.

शनिवार, 13 नवंबर 2010

अहसास

जीवन एक नवजीवन का
चक्र है यह अदभुत इश्वेर का
स्रष्टि ने है फिर से दोहराया  इतिहास
बेटी की कोख में पल रही है एक आस
याद आते हैं बो लम्हे जब हुआ था जन्म लाडली का
छोटी सी नाजुक सी गुडिया छाया था  सर्वत्र उल्लास
कब पली, बड़ी और था उस पर यौवन छाया
माँ का आँचल छोड़ कब चल पड़ी वह काया
पिया का अपने पाने को साथ
आज वही नन्ही कलि एक पुष्प बनी
और खुद चल पड़ी मातृत्व के नाजुक पल की ओर
कल जिससे गुजारी थी माँ उसी अहसास की ओर
याद आता है हरपल वो लम्हा जो गुजरा था मैंने
एक हकीकत के साथ .

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

नारी की व्यथा ?

जीवन के अतीत में झांकने बैठी मै
पायी वहां दर्दनाक  यादें और रह गयी स्तब्ध मै
समूचा अतीत था घोर निराशा और अवसाद में लींन
कुछ भी न था वहां खुशनुमा बन गई जिंदगी उत्साह हीन
बदरंग हो चुके थे सपने जीवन पथ था शब्दहीन
बच्चे भर रहे थे नए रंग, भबिष्य ने बुने सपने
यादें कर दी धूमिल सजा दिए रंग जीवन में अपने
मै आज तक ढो रहीं थी उन लाशो का गट्ठर
तिल तिल कर जी रही प्रतिदिन मर मरकर
शर्म और हया का उतार फेंका झीना आवरण
बच्चो ने था ठहराया सही यही मेरी तपस्या का है फल
किसी बक्त भी अगर गिर जाती थी मै नजरो में संतान की
जी न पाती उन  लाशों के भी कई गुना बोझ से
आज सर उठा कर जीती हूँ पाती हूँ उस दर्द से मुक्ति
नारीं जीवन की यही त्रासदी, फिर भी है वो दुर्गा शक्ति
पहले कुचली गई अपनों से, फिर सहा संतापं
यहाँ दबकर जमाना भी देता है कभी कभी घातक सा ताप
बरसो से यही है नारी की पीड़ा, भोगा इसको कभी सीता ने
सीता ने दी अग्नि परीक्षा, और अंतिम बेला पाया ढेर तिरस्कार
चली आ रही है यही परीक्षा, तिरस्कार और संताप
पाई न इससे कभी मुक्ति नारी हो तुम कैसी शक्ति
पूजी जाती अम्बा, दुर्गा और कहलाती पूर्ण शक्ति
कयूं नहीं मिलता नारी को सम्मान कियूं होता हर पथ पर तिरस्कार ??????????