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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

उमंग

उमंग अपने आंगन की 
नव सृजन, नव जीवन , नव आनंद है अपूर्व
कारण है इसके अंतस में समेटे खुश है वो खूब
बालकों का कलरव घर आँगन है खुशियों से पूर्ण
हृदय में है अनेको उमंगें उत्साह और  प्यार सम्पूर्ण
नाती का वो ठुमकना, चलना ,मचलना और इठलाना 
कर राह था वो सबको आनंदित घर आँगन था गुंजरित.
व्यंजनों की चटपटाहट, बर्तनों की खडखडाहट 
रसोई से उडती थी खुशबू और थी बच्चो की सुगबुगाहट 
बर्तनों की खड-खड, सेवको की चिड-चिड और अतिथियों की हर पल आहट
कब होता सूर्योदय और होता था कब अस्त ना थी कुछ खबर ना ही भनक 
मन भरता था कुलाचें और मस्तिस्क बहुत ही व्यस्त 
लगता था जिंदगी यूँ ही चलती रहे, शाश्वत और अनवरत 
समय का चक्र ना कभी रुका है ना ही रुकेगा 
हर पल को जी कर, दामन में समेट कर 
खुशियाँ लुटाकर, संतोष लूटकर
ह्रदय प्रफुल्लित है, आनंदित है हर पल जी कर ...

1 टिप्पणी:

संजय भास्कर ने कहा…

वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
बधाई.