
कलियुग में भी विवाह सम्बन्धी देन लेन, गलत रिवाज़ न बदले
दान- दहेज़, माता - पिता को, लड़के वालों के ढंग न बदले
पहले न था शिक्षा पर इतना जोर पर व्याह के खर्च पर था पूरा जोर
लड़की को दिखाना, उसकी नुमाइश , आज भी हालात है उसी ओर
पसंद आ गई तो रिश्ता पक्का वरना खाया पिया और चले खिसके
लड़की के दिल-दिमाग की तकलीफ का ना होता एहसास, न ही सोचते पुरानी तकलीफ से हटके
मानसिक यातना, वेदना बेइज्जती का बिटिया को होता एहसास
लड़के, उसके सम्बन्धी , माता पिता उनका इससे किया वास्ता
लड़का तो ऊँचे दाम पर बिक ही जायेगा आज नहीं तो कल कोई ऊँची कीमत ही तो लगाएगा
हालात आज भी बही है बिल्कुल भी न हैं बदले
बाप को चाहियें रुपया, बेटे को रंग गोरा और आधुनिक नवयौवना
आकर घर खाया पिया, जांचा-परखा और चले घर,जरा भी न दिल धड़का
बेचारी मासूम लड़की आज भी बहीं है खड़ी लीक वही उसी लीक चल रही है
उस मासूम के लिए क्यूँ नहीं दर्द किसी को उपजा ? क्यूँ, क्या कभी कलेजा धड़केगा ?
नहीं, शायद कभी नहीं क्यूंकि वो तो यहीं यातनाये और तकलीफों को
झेलने के लिए जन्मी हैं इस संसार में और सदैव झेलेगी यातनाओ को
यह समाज न बदला न ही कभी बदलेगा
क्या नहीं बदल पायेगा ये समाज ?
जो था कल बही है आज क्या इसको कहते है हम समाज
रोशी अग्रवाल