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शनिवार, 10 सितंबर 2011

दुखवा मै का से कहूँ ?

किसी ख़ुशी में भी, दर लगा रहता है 
नजर को जाती है फ़ौरन ख़ुशी भी 
जब कभी पंख लगाकर उड़ना चाह हमने 
आसमा में ढेरो गिद्द-बाज मडराते नजर आये 
फ़ौरन उड़ना भूल घोसले में बसेरा कर लिया 
जब कभी चाहा पाकछिओं की तरह हमने चह-चाहना   
गंदे- भद्दे अनर्गल भाषण सुने की बोलना भूल गए 
जब कभी चाहा स्वच्छंद विचरण यहाँ और वहां 
इतनी बंदिशे, इतनी यंत्रनाये मिली की चलना भूल गए 
जब चाहा खुल कर हँसना, बोलना बतियाना 
बंद कर दी गई, जुबान  की शब्दों का अर्थ भूल गए....
आखिर लड़की को ही इतनी बंदिसे क्यूँ ? 
क्यूँ  आज भी समाज उनकी खुशियों पर अंकुश 
लगता है चाहे बह महिला हो या पुरुष लेकिन 
आज भी सबाल है स्त्री जीवन ? 

9 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

उम्दा पंक्तियाँ..अभी भी बहुत कुछ बदलना बाकी है......

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन में रख संकल्प बना लें।

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

गहन चिन्तनयुक्त सहज अभिव्यक्ति...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

Dr Varsha Singh ने कहा…

शब्द-शब्द संवेदनाओं से भरी रचना ....

वन्दना ने कहा…

sach ko ukerti sashkat abhivyakti.

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) ने कहा…

अंतर्मन की बात बड़ी मासूमियत से कही गई है.

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपके पोस्ट पर पहली बार आया हूँ । बहुत अच्छा लगा । मेर पोस्ट पर भी आपका स्वागत है ।

किसी का दर्द हमें तकलीफ देता है ने कहा…

aapki rachna prabhavit karti hai, mera naman swikaar karen.

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