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बुधवार, 22 जनवरी 2014

Roshi: देश के नेता

Roshi: देश के नेता: जब घर- द्वार ,अंदर-बाहर कंही भी जमा हो जाये धुल -मिटटी  तो लेती है जरूर काफी वक्त हटाने में वो गंदगी  पर ना जाने क्योँ चाहते हैं हम बस कुछ ...

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

देश के नेता

जब घर- द्वार ,अंदर-बाहर कंही भी जमा हो जाये धुल -मिटटी 
तो लेती है जरूर काफी वक्त हटाने में वो गंदगी 
पर ना जाने क्योँ चाहते हैं हम बस कुछ ही लम्हों में एकदम सफा करना उसको 
जो काई जमीं है बरसों से उलीचना उसको है नामुमकिन 
यह ही हाल है कुछ मेरे देश का इस वक्त दोस्तों 
अरे ,हम किसी पार्टी ,नेता की ना कर रहे हैं तरफदारी दोस्तों
जब इतना लंबा अरसा गुजार दिया गंदगी के दामन में
तो फकत कुछ वक्त तो दो नए बन्दों को
हमारे देश की जड़ों तक जो फ़ैल चुका है जहर इस नामुराद गंदगी का
उसको बुहारने का ,जड़ों तक पहुचने को जरूरत है कुछ नए इंसानों की
अब तक फैलाया है मकडजाल जिन्होंने उसको तोड़ने की
शायद इनसे सीखें कुछ सीख पुराने देश के करनधार
की हो गयी है अब जनता भी तैयार अपना परिवेश साफ़ करने को
वो भी सीख गयी है आस -पास फैली गंदगी बुहारना
अब जो नेता कुछ करेगा वही देश का परचम फैलाएगा

शनिवार, 18 जनवरी 2014

बेटियां और धान का पौधा

बेटियां और धान का पौधा ,पाते हैं दोनों एक सी किस्मत
बोई जाती हैं कहीं ,रोपी जाती हैं रही और कंहीं ....
किस्मत होती अच्छी ,मिलती पौधे को उपजाऊ जमीं
खिल उठता ,फल -फूल जाता पाकर उचित देखभाल
बेटियां भी अगर पाती संस्कारी परिवार ,तो दमक उठता उनका रूप
बरना तो कम पानी ,बंजर जमी में जैसे तोड़ देता दम पौधा
बेटियां भी तिल -तिल रोज मरती हैं नए परिवेश में
करनी होती है दिल से दोनों की देखभाल नए माहौल में
थोड़ी सा भी ध्यान दिया नहीं की खिलखिला उठते हैं दोनों
अच्छी फसल धान की भरती है जैसे घर किसान का
वैसे ही भर देती हैं बेटियां ससुराल का आँगन ढेर सी खुशिओं से ......

Roshi: लक्ष्मण रेखा .......

Roshi: लक्ष्मण रेखा .......: क्यों कर हम बचपन से सदेव लड़किओं को ही देते रहे हैं उपदेश  हमारी माँ ने हमको समझाया बाल्यकाल से ही हमारी मर्यादा की सीमायें  जो हम सुनते आये...

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

Roshi: लक्ष्मण रेखा .......

Roshi: लक्ष्मण रेखा .......: क्यों कर हम बचपन से सदेव लड़किओं को ही देते रहे हैं उपदेश  हमारी माँ ने हमको समझाया बाल्यकाल से ही हमारी मर्यादा की सीमायें  जो हम सुनते आये...

लक्ष्मण रेखा .......

क्यों कर हम बचपन से सदेव लड़किओं को ही देते रहे हैं उपदेश 
हमारी माँ ने हमको समझाया बाल्यकाल से ही हमारी मर्यादा की सीमायें 
जो हम सुनते आये थे उन्ही परम्पराओं की डोरी से बाँधा अपनी बच्यौं को 
अब जब हमारी बच्ची बन गयी है खुद मां तो कहते सुना उसको सब यथावत 
चार पीड़ी से चल रही हैं लड्कियुं के लिए सब कुछ वैसे का वैसा ........
ना समाज में ,ना घर में ,ना देश में बदला है कुछ स्त्रियुं के वास्ते
ना सतयुग ,ना त्रेता युग और ना ही कलयुग ला पाया तनिक सा भी बदलाव
जो लक्ष्मण रेखाएं खिचीं थी सतयुग में ,बरक़रार है आज भी उन रेखाओं का वजूद
प्रताडना ,नित नए जुल्म,जलाना,बलात्कार , मानसिक शोषण बरक़रार हैं यूँ ही
कभी किसी राम ,कृष्ण के लिए नहीं खींची कोई रेखा ना हम आज भी सिखा रहे
कोई मर्यादा का पाठ अपने लडको को की रहें वो भीतर अपनी लक्ष्मण रेखा के
संयम का पाठ पढाना जरूरी है उनको भी बालपन से ही लड्कियुं के साथ -साथ .....

बुधवार, 15 जनवरी 2014

Roshi: शरद ऋतू

Roshi: शरद ऋतू: शरद ऋतू में कभी बंद दरवाजे की झिरी के पास तनिक बैठ के देखो मिनटों में एहसास हो जायेगा उस बेदर्द सर्द हवा का जो गलाती है हड्डी रोज उन गरीब...

Roshi: शरद ऋतू

Roshi: शरद ऋतू: शरद ऋतू में कभी बंद दरवाजे की झिरी के पास तनिक बैठ के देखो मिनटों में एहसास हो जायेगा उस बेदर्द सर्द हवा का जो गलाती है हड्डी रोज उन गरीब...

Roshi: माँ की तेहरवीं पुण्य तिथि पर

Roshi: माँ की तेहरवीं पुण्य तिथि पर: आप चली गयीं उस जहाँ में जहाँ ना कोई आपसे मिल सकता लगता है हर पल आप यहीं हैं ,हर पल यहीं हैं ........ घर ,आँगन में है हर पल आपका प्यार -...

शरद ऋतू

शरद ऋतू में कभी बंद दरवाजे की झिरी के पास तनिक बैठ के देखो
मिनटों में एहसास हो जायेगा उस बेदर्द सर्द हवा का जो गलाती है हड्डी
रोज उन गरीबो की जिन्होंने कदाचित कभी कपडा ही ना डाला हो जिस्म पर अपने
कभी गुजारकर देखो एक रात बिना किसी छप्पर के ,छत के सिर्फ एक रात
तड़प -तड़प जायेगा वजूद ,सिहर जायेगी आत्मा बगेर किसी आसरे के
होगा शायद थोडा चड भर का एहसास उन बेघरों का जो सिर्फ मिटटी में ही
पैदा होते और वहीँ मर मिट जाते ,बगेर किसी घर -द्वार के
सोने को बिस्तर ,तन पर कपडे ,थाली में भर पेट भोजन
अंग -हीन काया देख करो अदा शुक्रानाउस परवरदिगार का
जो बक्शी है सुंदर काया उसने तुमको और बरसाई हैं ढेरों नेमते तुम पर
रात -दिन मे एक प्रहर सो कर देखो कभी भूखे पेट कुलबुलाती अंतडियो
से होगा महसूस उस भूख का जो कभी ना होने दी महसूस उस विधाता ने तुमको
सिर्फ एक चड का शुकराना ही काफी है उस ईश्वर के वास्ते ,सिर्फ एक चड का
कितनी रहमतें है बरसाईं उसने हम पर,पर हम रहे उसके नाशुक्रे ही ताजिंदगी
ना खुद को रख पाए कभी खुश ,ना सजदा किया दिल से उस उपरवाले का
अब भी है जिंदगी में काफी वक्त उसका शुक्रिया अदा करने का ,सजदा करने का ........... 

रविवार, 5 जनवरी 2014

माँ की तेहरवीं पुण्य तिथि पर



आप चली गयीं उस जहाँ में जहाँ ना कोई आपसे मिल सकता
लगता है हर पल आप यहीं हैं ,हर पल यहीं हैं ........
घर ,आँगन में है हर पल आपका प्यार -दुलार है बरसता
देहरी जोहती है बाट आपकी ,करके गयीं थीं उससे वापिस आने का वायदा
हर पल मन दूंद्ता है आपको ,पर है ना कोई फायदा .......
पता नहीं कि हमारी तकलीफ  का अंदाज़ हो रहा होगा आपको कितना
बस दिल से सभी करतें है यह ही दूया आप जहाँ हो खुश रहो
क्योंकि अब धीरे -धीरे डाल ली है आदत जीने कि आपके बिना ...........