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शनिवार, 18 जनवरी 2014

बेटियां और धान का पौधा

बेटियां और धान का पौधा ,पाते हैं दोनों एक सी किस्मत
बोई जाती हैं कहीं ,रोपी जाती हैं रही और कंहीं ....
किस्मत होती अच्छी ,मिलती पौधे को उपजाऊ जमीं
खिल उठता ,फल -फूल जाता पाकर उचित देखभाल
बेटियां भी अगर पाती संस्कारी परिवार ,तो दमक उठता उनका रूप
बरना तो कम पानी ,बंजर जमी में जैसे तोड़ देता दम पौधा
बेटियां भी तिल -तिल रोज मरती हैं नए परिवेश में
करनी होती है दिल से दोनों की देखभाल नए माहौल में
थोड़ी सा भी ध्यान दिया नहीं की खिलखिला उठते हैं दोनों
अच्छी फसल धान की भरती है जैसे घर किसान का
वैसे ही भर देती हैं बेटियां ससुराल का आँगन ढेर सी खुशिओं से ......

5 टिप्‍पणियां:

मिश्रा राहुल ने कहा…

काफी उम्दा प्रस्तुति.....
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (19-01-2014) को "तलाश एक कोने की...रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1497" पर भी रहेगी...!!!
- मिश्रा राहुल

Amrita Tanmay ने कहा…

कितनी समानता है।

Minakshi Pant ने कहा…

नारी वेदना को परिभाषित करने में सफल रचना |

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (20-01-2014) को चर्चा कथा में चर्चाकथा "अद्भुत आनन्दमयी बेला" (चर्चा मंच अंक-1498) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर रचना !