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रविवार, 8 अप्रैल 2012

मन का कोना


संगीत है .स्वर बिखरे हैं ,कोलाहल है पर मन का कोना खाली है
शहनाई है ,बाजा है ,बारात है ,बाराती है पर मन का कोना खाली है
नवबालको का रुदन है .उनका क्रंदन है पर मन का कोना खाली है
बाल अठखेलियाँ  हैं ,,मस्ती है हठ है पर मन का कोना खाली है
छायाहै सर्वत्र उल्लास , घर करता पाहुनों का इंतजार पर मन का कोना खाली है
यह कैसी लीला है उस प्रभु की ?कि मन का कोना शायद विधाता भरना भूल जाता है
हम जब हुई थी पैदा तो बताया कि बड़े होने पर खाव्ब होंगे पूरे
बड़े होने पर समझाया शादी के बाद ही बेटियां सपने पूरे करती हैं
विवाह के बाद पता चला माँ बनने के बाद ही नारी होती है सम्पूर्ण
 तो न तो बचपन में मन का कोना भर पाया न ही युवावस्था में
यह ही है हकीकत हम सभी नारी जात की