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शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

बरसता सावन

टिप -टिप गिरती बूंदों की आवाज़
कर रही थी यूँ रात्रि की निस्तब्धता भंग
दूर कही कोई छेड़ रहा हो जलतरंग 
झींगुरों की सरसराहट भी बना देती है अद्भुत समां 
कोई है मदमस्त सावन की रूमानियत में 
किसी का होश है हुआ इस सावन में गुमां 
नन्हे बालक ले रहे पूरा आनंद उस घुमड़ते सावन का 
अब कहाँ रहे वो भीगते प्रेमी युगल इस मद मस्त सावन में
हो गयी हैं अब यह किताबी बातें सिर्फ इस जहाँ में 
बदल लिया है अब शायद प्रकृति ने भी अपना स्वरुप 
ना वो रहे काले घुमड़ते ,लरजते ,बरसते मेघ 
न रहा वो सावन में भीगने ,लुत्फ़ उठाने का आनंद  

नव बर्ष

यूँ  तो नववर्ष मानते आये हैं हम हर बार,
हर साल नया शहर, नया परिवेश और नए रूप धारण करते हैं हर बार,
खूब धूम धड़ाका, आतिश बाजी, कॉकटेल, पार्टियाँ करते हैं हर साल ,
नए सपने नए ख्वाब, नयी खुशियों से लवरेज रहती ज़िन्दगी हर बार,
पर क्यों न मनाये नव वर्ष एक नव नूतन रूप में इस बार ,
अभी तक तो थी उलझी रही ज़िन्दगी सिर्फ में , मेरा परिवार , मेरे बच्चे और मेरे घर में ,
कभी भी  न सोचा  देश, समाज और नगर के बारे में,
अब जागो, तनिक सोचो जिस देश समाज से हो तुम जाते जाने और पहचाने,
उसकी कभी भी न की महसूस, ज़रा भी जिमेदारी हमने,
तनिक न सोचा अवला, दीन, दुखी और अनाथों के बारे में
"जब जागो तभी सवेरा " देर अभी भी न हुई है जागने में ,
आज ही ले लो कोई प्रण, कसम, इस नव वर्ष पर अभी से
एक भी दुखी पर की गयी दया हर लेगा सारा चिंतन ज़िन्दगी से ,
नव उर्जा, प्रफुल्लित मन भर देगा  खुशियों  से सारा घर आँगन