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गुरुवार, 19 जनवरी 2012

सर्दी का मौसम


सर्दी का मौसम अमीरों को ही है भाया,बेचारे गरीब की तो वैसे ही लाचार है काया
गर्मी की मार तो वो झेल ही जाता है ,गिरते छप्पर में टूटी झोपडी में जी ही जाता है
दीवारों के सूराखों से घुसती प्रचंड वायु हिला जाती है गरीब की सम्पूर्ण काया
नस्तरों की चुभन से भी ज्यादा घायल कर जाती गरीब का तन और मन
बिना बिछावन के और बिना रजाई इस शीतल पूस की रात्रि में
कैसे जी सकता है इंसा ?..जिसने भोगाउसी का जाने तन ............
हाड कपाँदेने वाली ठण्ड में भी कैसे जिया जाता है इन गरीबो से कोई सीखे
बदन पर तार-तार हुई वस्त्र ,नस्तर चुभातीशीत वयार
हडियाँ तक कंपा जाती हैं अमीरों की बैठते हैं दिन भर जो हीटर ,अंगीठी को जलाये
पर यह लाचार खुद और परिवार समेटे काटते हैं कैसे पूस की रात ?
मर -मर के जीना फिर उठाना फिर मरना तो शायद  नियति और जिन्दगी है इनकी