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शनिवार, 28 जनवरी 2017

Roshi: आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा चौदह वर्ष...

Roshi: आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा चौदह वर्ष...: आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा चौदह वर्ष कैसे गुजारे होंगे सती ने उन पिशाचों के बीच ना कोई ख़त न था कोई सन्देश परस्पर प...
आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा
चौदह वर्ष कैसे गुजारे होंगे सती ने उन पिशाचों के बीच
ना कोई ख़त न था कोई सन्देश परस्पर पति -पत्नी के बीच
इंतजार भी खतम हुआ उस निर्मोही का ,भेज दिए थे जिसने दूत
छुद्र मानसिकता का जिसने दिया था अपना सबूत
वनगमन को जाते ना सोचा कदापि उस नववधु उर्मिला के वास्ते
कर दिया उसके सपनों पर तुषारापात ,अँधेरे कर दिए थे उसके दिन और रात
काश दिखाया होता बद्दप्पन ,ना छुड़ाया होता उर्मिला से लच्छमन का साथ
उसकी पीड़ा का नहीं है कंही इतिहास में कोई पन्ना
नामुमकिन है उर्मिला सरीखा जीवन जीना
काश राजा राम ने दिखाया होता थोडा सा भी बद्दप्पन
निज आदर्शों को त्याग कुछ सोच होता उपर उठकर
तो दोनों बहनों की ताक़त ,त्याग ,को जमाना देखता कुछ हटकर

व्यथा

आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा
चौदह वर्ष कैसे गुजारे होंगे सती ने उन पिशाचों के बीच
ना कोई ख़त न था कोई सन्देश परस्पर पति -पत्नी के बीच
इंतजार भी खतम हुआ उस निर्मोही का ,भेज दिए थे जिसने दूत
छुद्र मानसिकता का जिसने दिया था अपना सबूत
वनगमन को जाते ना सोचा कदापि उस नववधु उर्मिला के वास्ते
कर दिया उसके सपनों पर तुषारापात ,अँधेरे कर दिए थे उसके दिन और रात
काश दिखाया होता बद्दप्पन ,ना छुड़ाया होता उर्मिला से लच्छमन का साथ
उसकी पीड़ा का नहीं है कंही इतिहास में कोई पन्ना
नामुमकिन है उर्मिला सरीखा जीवन जीना
काश राजा राम ने दिखाया होता थोडा सा भी बद्दप्पन
निज आदर्शों को त्याग कुछ सोच होता उपर उठकर
तो दोनों बहनों की ताक़त ,त्याग ,को जमाना देखता कुछ हटकर

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

Roshi: अरसे बाद नैनीताल जाना हुआ और वहां बच्चे हॉस्टल मे...

Roshi: अरसे बाद नैनीताल जाना हुआ और वहां बच्चे हॉस्टल मे...: अरसे बाद नैनीताल जाना हुआ और वहां बच्चे हॉस्टल में पड़ते थे उनको लेने छोड़ने जाना होता था तो वो जो पीड़ा होती थी उसका दर्द बहुत महसूस होता ...
अरसे बाद नैनीताल जाना हुआ और वहां बच्चे हॉस्टल में पड़ते थे उनको लेने छोड़ने जाना होता था तो वो जो पीड़ा होती थी उसका दर्द बहुत महसूस होता है आजतक .......मन किया कुछ लिखूं


वही थी राह ,वही था समां ,और थी वही मंजिल
दिल की धड़कन भी थी सही ,बाहर मौसम भी था खुशगवार
लुफ्त उठा रहे थे नजारों का ,आकाश और हिम आच्छादित पर्वत
दे रहे थे मन को सुकूं और मन भी था आल्हादित
सफ़र पर जाने से मन था पूर्णतया रोमांचित
यादें रह -रह कर ले जा रही थीं भूतकाल में बरबस
बड़ा ही मुश्किल ,नीरस ,अकल्पनीय ,सफ़र था तय किया मैंने
जब जाती थी इन राहों पर अपने नौनिहालों को सिसकते -बिलखते लेकर
हॉस्टल में भेजना शायद तब थी मेरी मजबूरी और जरूरत
वक़्त के मरहूम ने भर दिए थे सारे जख्म ,,,,गुजरे जब उन राहों से
बरबस पीड़ा दे गयीं वो यादें और लिकने बैठ गए हम