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गुरुवार, 26 मई 2011

मासूम परी

वो है मासूम परी, इतनी कोमल जैसे मिश्री की डाली 
उसका मन निर्मल, स्वभाव शांत और 
कियूं कर ईश्वर ने बनाया उसको ऐसा ? 
थी वो कोई इश्वेर्ये वरदान जो मिली थी उसको वो लली 

आत्मा भी थी उसकी शुद्ध, न थी कोई तामसी ब्रती वहां 
आज की युग में भी कोई बालक हो सकता है कहाँ ? 

न थी उसको कोई जेवर, कपडे और किसी भी उत्पात की चाह
बस सदा जीवन उच्च विचार ही था उसकी राह

कभी भी , कहीं भी , किसी भी चीज को ना थी उसको जरुरत 
किया ईश्वर ने बनाया था उसका स्वभाव या उसने खुद बना ली थी फितरत 

दूसरो को ही देना, कभी खुद कुछ न लेना ऐसा था उसका स्वभाव 
कहना आसन लगता है पर निभाना है मुश्किल ऐसा वर्ताब 

माँ होकर भी हरदम सोचती कियूं न उसको कभी भी मन न चलता 
कितना सयंम , था उसको मन पर यह कभी भी दूसरे को ना पता चलता ...


सुनो दोस्तों

विधाता ने तो दिया ऐसा सुंदर मानव रूप हमको 

दिए हमको गम तो बक्श दी ठेरों इनायतें हम पर 

कभी स्याह , कभी सफ़ेद दिखा दिए सब सपने हमको 

अगर रहता स्याह रंग से सरोबर जीवन हमारा 

तो सफ़ेद रंग का ना देख पते हम अदभुत नज़ारा 

जो भी ख़ुशी मिले जियो सदैव हंस के मेरे दोस्तों 

और मिले जो कभी गम तो उसे भी लगा लो गले दोस्तों 

दुःख देती तकलीफे

बहुत दुःख होता है अपनों को देखना तकलीफ में 
पर सोचने से किया होता है 
जब भी आती है बच्चो को तकलीफ 
तड़प उठता है मन होती है बहुत टीस
पर अपने- अपने हिस्से की तकलीफ तो उठानी होती है सबको 
बरना तो माँ उठा लेती है अपने कन्धो पर दुःख का सारा बोझ 
और तिनका भर भी दुःख ना आने देती पास वो बच्चो के 
उसकी दुनिया तो घुमती है उसके नैनिहालो के पास 
पर बालको का तड़पना कर देता है व्यथित उसको 
देखकर उसकी तकलीफ होती हूँ हर- पल परेश: ....