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रविवार, 8 अप्रैल 2012

मन का कोना


संगीत है .स्वर बिखरे हैं ,कोलाहल है पर मन का कोना खाली है
शहनाई है ,बाजा है ,बारात है ,बाराती है पर मन का कोना खाली है
नवबालको का रुदन है .उनका क्रंदन है पर मन का कोना खाली है
बाल अठखेलियाँ  हैं ,,मस्ती है हठ है पर मन का कोना खाली है
छायाहै सर्वत्र उल्लास , घर करता पाहुनों का इंतजार पर मन का कोना खाली है
यह कैसी लीला है उस प्रभु की ?कि मन का कोना शायद विधाता भरना भूल जाता है
हम जब हुई थी पैदा तो बताया कि बड़े होने पर खाव्ब होंगे पूरे
बड़े होने पर समझाया शादी के बाद ही बेटियां सपने पूरे करती हैं
विवाह के बाद पता चला माँ बनने के बाद ही नारी होती है सम्पूर्ण
 तो न तो बचपन में मन का कोना भर पाया न ही युवावस्था में
यह ही है हकीकत हम सभी नारी जात की  

6 टिप्‍पणियां:

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

Roshi ji aapke rachna me nari ki samajik avhelna ki vidmbna hai......sarthk lekhn .....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

उल्लास मन में भरा रहे, खालीपन धीरे धीरे साथ छोड़ देगा।

Saras ने कहा…

सच कहा रोशिजी .....इस विडम्बना से हम सबको झूझना है ...झूझते आ रहे हैं ...!!!!

Sunil Kumar ने कहा…

संवेदनशील रचना आभार

vikram7 ने कहा…

संवेदनशील रचना

सतीश सक्सेना ने कहा…

जीवन में आशा और इच्छाएं आवश्यक हैं , निराशा से बाहर आना होगा !
शुभकामनायें आपको