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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

जीने की आशा


जान अपनी कितनी होती है कीमती देखा कल निज आँखों से
पकड़ा था लोगो ने एक चोर को रंगे हाथ अपने हाथों से
कितना मार-मार कर किया था लहूलुहान लातों और घूंसों से
 मरंतुल ही लगभग हो चुका था वो इन्सान अपनी सांसो से
उस भीड़ में हर इन्सान ने लगभग हाथ साफ़ कर ही लिए थे
गूँज उठा तभी पुलिस van का सायरन कही दूर से
जरा सबकी नज़र हटी .और हो गयी पकड़ ढीली उस चोर से
उस मुर्दा शरीर में जान पड़ी इतनी तेज़ी और जोर से
वो भागा इतना सरपट बचने को उस खतरनाक भीड़ से
क्या जिन्दगी  जीने का जज्बा बना देता है इतना मज़बूत अंदर से
सुना ही था ,पड़ा था किताबो में पर देखा आज आँखों से  

4 टिप्‍पणियां:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

NICE

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जिजीविषा शक्ति और ऊर्जा ढूढ़ लाती है।

Dasarath Singh ने कहा…

जीने की आशा...
प्रभावशाली प्रस्तुति |

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रभावशाली रचना..