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मंगलवार, 7 जून 2011

Roshi: Roshi: बेटियां ही कियूं सहती हैं

Roshi: Roshi: बेटियां ही कियूं सहती हैं: "Roshi: बेटियां ही कियूं सहती हैं : 'बेटियां जब कोख में आती हैं तब भी दुःख देती हैं पैदा जब होती हैं, इस घिनौने संसार में तब भी दुःख देती है..."

12 टिप्‍पणियां:

Minakshi Pant ने कहा…

betiyan sehti jrur hain par vo dukh kisi ko nahi deti dost vo to sbka jivan khushiyon se bharti rehti hai :)

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

फिर भी बेटियां अव्वल हैं....

Dr Varsha Singh ने कहा…

विचारणीय है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

एक विचारणीय प्रश्न!

veerubhai ने कहा…

आधी दुनिया के प्रति इस समाज का नज़रिया बहुत संकुचित है ,अ-वैज्ञानिक है .पुरुष भी बाँझ होतें हैं .(लो स्पर्म काउंट लिए घूमतें हैं ,या फिर स्पर्म्स में वो मोटि -लिटी(प्रजनन करने का दम ख़म तेज़ी ही नहीं रहती ,फिर भी बांझपन का ठप्पा लगता है नारी के सिर पर .) .अच्छे मुद्दे उठा रहीं हैं आप आप बीती के ज़रिये जन शिक्षण भी कर रहीं हैं आप .हमने आपकी सभी पोस्ट अथ से अंत तक पढ़ी हैं .शुक्रिया भी आपका आभार भी .

Jyoti Mishra ने कहा…

because of narrow mindedness of some really retarded people.

Kailash C Sharma ने कहा…

यह हमारी दकियानूसी सोच का परिणाम है..केवल बेटियाँ ही आज के समय में सुख का श्रोत हैं..बहुत विचारणीय पोस्ट..

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

लीगल सैल से मिले वकील की मैंने अपनी शिकायत उच्चस्तर के अधिकारीयों के पास भेज तो दी हैं. अब बस देखना हैं कि-वो खुद कितने बड़े ईमानदार है और अब मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर ही एक प्रश्नचिन्ह है

मैंने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर श्री बी.के. गुप्ता जी को एक पत्र कल ही लिखकर भेजा है कि-दोषी को सजा हो और निर्दोष शोषित न हो. दिल्ली पुलिस विभाग में फैली अव्यवस्था मैं सुधार करें

कदम-कदम पर भ्रष्टाचार ने अब मेरी जीने की इच्छा खत्म कर दी है.. माननीय राष्ट्रपति जी मुझे इच्छा मृत्यु प्रदान करके कृतार्थ करें मैंने जो भी कदम उठाया है. वो सब मज़बूरी मैं लिया गया निर्णय है. हो सकता कुछ लोगों को यह पसंद न आये लेकिन जिस पर बीत रही होती हैं उसको ही पता होता है कि किस पीड़ा से गुजर रहा है.

मेरी पत्नी और सुसराल वालों ने महिलाओं के हितों के लिए बनाये कानूनों का दुरपयोग करते हुए मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज करवा दिए..मैंने पत्नी की जो मानसिक यातनाएं भुगती हैं थोड़ी बहुत पूंजी अपने कार्यों के माध्यम जमा की थी.सभी कार्य बंद होने के, बिमारियों की दवाइयों में और केसों की भागदौड़ में खर्च होने के कारण आज स्थिति यह है कि-पत्रकार हूँ इसलिए भीख भी नहीं मांग सकता हूँ और अपना ज़मीर व ईमान बेच नहीं सकता हूँ.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

चिंताजनक सवाल.

daanish ने कहा…

सब
मननीय .... !

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

Oh, yahi to vidambana hai.