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मंगलवार, 7 जून 2011

मेरी दुनिया

ग़मों से तो बहुत पुराना नाता रहा है हमारा 
होश संभाला तो लड़का न होने का मलाल करते पाया 
कुछ बड़े हुए तो रंग सांवला होने का ज़माने ने लगाया ताना 
जैसे-तैसे व्याह हुआ तो ना मिला वहां भी कोई हमारा
ना देखता गुणों को कोई वस अपबाद बताते सारा  

फिर  जन्मी बेटियां , वो भी दिया दोष हमारा  
बेटियां लातीं इनाम और पिता की सारी तकलीफों
सारा हिस्सा था हमारा 
पर कहते है न की घूरे के भी दिन बहुरते हैं ?  
हमारा भी समय चक्र पलटा और पाया बच्चो अपने बच्चो का सहारा 
बेटियों ने किया नाम रोशन और जगमग हुआ आज संसार हमारा ..

3 टिप्‍पणियां:

शिखा कौशिक ने कहा…

बच्चो का सहारा बेटियों ने किया नाम रोशन और जगमग हुआ आज संसार हमारा .
daughters are more caring than sons .they are our proud .great poem .

veerubhai ने कहा…

A female has no role in deciding the sex of a child .She is a x -x individual ,while a male is a x -y individual .
If x comes from husband it is a girl if y comes from male it is a boy .
आधी दुनिया के प्रति इस समाज का नज़रिया बहुत संकुचित है ,अ-वैज्ञानिक है .पुरुष भी बाँझ होतें हैं .(लो स्पर्म काउंट लिए घूमतें हैं ,या फिर स्पर्म्स में वो मोटि -लिटी(प्रजनन करने का दम ख़म तेज़ी ही नहीं रहती ,फिर भी बांझपन का ठप्पा लगता है नारी के सिर पर .) .अच्छे मुद्दे उठा रहीं हैं आप आप बीती के ज़रिये जन शिक्षण भी कर रहीं हैं आप .हमने आपकी सभी पोस्ट अथ से अंत तक पढ़ी हैं .शुक्रिया भी आपका आभार भी .

aditi ने कहा…

awesome