घर परिवार, वातावरण-सभी जगह होता है आनन्द ही आनन्द
गर्मी से जब होती मुक्ति, शरीर, मस्तिस्क सभी होता है प्रफुल्लित
साफ़ सफाई, साज श्रृंगार , नवीन वस्त्र सभी करते आनंदित
शादी, लग्न , उत्सवो की भी लग जाती है जैसे झड़ी रोज घर बाहर
सभी कर रहे थे इंतजार इस मौसम और आन्नद का हर बार
दीपकों की अदभुत छठा, बिजली की लड़ी,पटाखों का शोर
जो आती होंगी दूर देश से समेट ह्रदय में भाइयों का प्यार
माँ बाप भी तक रहें है द्वार कि कब आएगी लाडली पूरण करने त्योंहार....
रोशी अग्रवाल



1 टिप्पणी:
चमकते, दमकते दीपों का उत्सव।
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