माँ के भक्त बने वो घंटो मंदिर में कीर्तन किया करते हैं
घर आकर पत्नी और बेटी पर सितम बेहिसाब ढाया करते हैं
नवरात्री में सिर्फ फलाहार का सेवन किया करते हैं
बेटी और माँ भूखे पेट नित्यप्रति सो जाया करते हैं
दक्षिणा में मिले रूपए मदिरालय में जाया करते हैं
माँ -बेटी फूटी कौड़ी को भी हर रोज तरस जाया करते हैं
रखते तो माँ के व्रत हैं पर हर स्त्री पर कामुक नज़र रखते हैं
माँ -बेटी को दरिंदगी हैवानियत की हदों से भी बदतर रखते हैं
मंदिर में बैठकर वो माँ की महिमा का बखान करते हैं
घर पर लात घूंसे से ही बातों का आगाज़ करते हैं
इतना बदसूरत विरोधाभास हम अक्सर अपने आसपास देखा करते हैं
रोशी अग्रवाल
3 टिप्पणियां:
विरोधाभास को बताने में सफल है यह रचना...
बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति ।
प्राय: दुहरे चरित्र दिख रहे हैं ।
बधाई ।
समाज का विचित्र स्वरूप।
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