छतों पर गुनगुनी धूप में स्वेटर बुनती,ऊन के गोले बनाती स्त्रियाँ ना दिखेंगी
बतियाती औरतों के हाथ सलाई पर दौड़ते ,झटपट मोजा ,टोपा बुनती ना दिखेंगी
पड़ोसन का डिजाईन एक बार में आँखों में उतार लेने की कला अब सिमट गयी
सलाई ,ऊन के गोले ,डिज़ाइन की किताबें सब रद्दी में बिक गयीं ,विलुप्त हो गयीं स्वेटर बुनने की कला प्रदर्शित करने को स्त्रियों को सर्दी का इंतजार रहता था
क्रोशिया से झट कम्बल ,स्वेटर बनाने की होड़ सारा मोहल्ला सर्दी भर करता था
बुनने के साथ उधेड़ने में पल ना लगाती थीं स्त्रियाँ ,झट नया डिजाईन बुन लेती थीं
हाथों में क्या जादू था ?आँखों से ही झट नाप लेती थीं सलाई सिरहाने रख सोती थीं
--रोशी
गुरुवार, 18 दिसंबर 2025
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