शनिवार, 9 मई 2026

 


तिनका -तिनका जोड़ चिड़ा-चिड़िया घरोंदा हैं बनाते
हफ़्तों गुजार देते बारी-बारी अण्डों को सेने में वक़्त वो गुजारते
मीलों उड़ान भर दाना चुग -चुग हैं लेकर आते ,निज अस्तित्व हैं मिटा देते
दुनिया उनकी सिमट जाती बस नौनिहाल को परिपकव करने पालने में
भान भी ना होता तनिक कि वक़्त आने पर छोड़ उड़ जाएगा आकाश में
वापिस ना आने के लिए उस नीड़ औरअपने जन्मदाता के आगोश में
इन्सान भी अपना सर्बस्व न्योछावर कर देता है अपनी औलाद को पालने में
इंसान जिन्दगी गुजार देता इस दर्द और टीस के साथ औलाद की यादों में
--रोशी

 


बेटियों को ताकीद कर दी जाती है ,मेहमान हैं वो पीहर में
समझौता ,सहनशीलता की घुट्टी ठूंस दी जाती है उनकी रगों में
दर्द ,तकलीफ शायद नियति ही बन जाती है बचपन से जीवन में
परिवार ,समाज के जुल्म के खिलाफ आवाज घौंट दी जाती है छुटपन में
शौक,खुशियाँ अब मिलेंगी तुझको सिखाया जाता है रोज़ हर लम्हे में
ससुराल का ख्वाब मिनटों में भरभरा जाता है जब रखती बिटिया कदम ससुराल में
जायदाद से रहती महरूम उम्र भर,रात दिन खटने की जिम्मेदारी उसके पाले में
उम्र गुजार देती इसी जद्दोअहद में कौन सा घर है उसका ससुराल-पीहर दोनों में
--रोशी 

 


क्या सुना है कभी ,माँ ने किसी पागल को जना है ?
माँ की कोख से सदेव एक तंदरुस्त बालक ही जन्मा है
समाज के तरकश और तानों से ही शायद वो पागल हुआ है
बेहिसाब धोखों के खंजरों ने उसका दिल दिमाग बिदीर्ण किया है
कमतरी का एहसास दिला कर उसका हौसला ,रुतबा समेट दिया है
जब -जब कोशिश की अपने पाँव पर खड़े होने की ,नीचे से जमीन को समेटा है
हर लम्हा बस उसकी कमज़ोरियों का उसको बदस्तूर एहसास करवाया है
ईश्वर ने स्वस्थ -तंदरुस्त भेजा था धरती पर ,समाज ने उसको पागल बनाया है
--रोशी

 


नवरात्री का त्यौहार ,ढोल मंजीरो की झंकार
माँ के भजन,मां का भव्य सजा सुन्दर दरबार
गली -मोहल्ले में हो रहे जगराते ,माँ का जय -जयकार
अद्भुत माहौल बना देता नवरात्री का अनुपम त्यौहार
हवन सामग्री की पावन सुगंध ,धूप-कपूर की महक
घर- चौबारा खिल उठता जब फैलती हैआम्र पल्लवों की महक
अष्टमी-नवमी पर कन्याओं का पूजन ,हर घर जोहता उनका आगमन
हलवा -पूरी की सुगंध ,उम्दा खुशबू चनों की जोह लेता सबका मन
--रोशी

 


महिला दिवस की शुभकामनाएं
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भीतर तनिक झांक कर देखो ,कुछ पल निज अहमियत को पहचानो
अपनी इस्मिता ,अस्तित्व की लड़ाई तो गर्भ से सीख कर जन्मी हो तुम
परिवार,समाज के तानों,उलहानों का सबक जन्मजात ही पाया तुमने
इज्ज़त ,मर्यादा की रक्षा करना सीखो ,अद्भुत दैवीय शक्ति पाई है तुमने
दहेज़ के दावानल में होम होने से पहले खुद के पाँव पर खड़ा होना सीखो
पग -पग पर दुशासन ,दुर्योधन खड़े हैं उनसे लड़ने के दांव पेंच खुद सीखो
--रोशी 

 


अंत तो निश्चित है युद्ध का पर कब यह ना सुनिश्चित है
अहम् ,वर्चस्व ,बदनीयती का खेल है सारा ,पर विनाश निश्चित है
टूटी इमारतें ,ध्वस्त खँडहर में तब्दील शहर ,सिसकती बची नस्लें
आबाद करने में लग गए जिसको बरसों चंद लम्हों में सिमट गयीं सांसें
फक्र था जिनको अपनी रवायतों,परम्पराओं और अपनी बादशाहत पर
अक्लऔर काबिलियत का इस्तेमाल किया दुनिया ने सिर्फ प्रकृति के विनाश पर
क्या बचेगा युद्ध के बाद इस धरती पर ?अनाथ बच्चे ,बिधवाएं,नेस्ताबुत जमीन
युद्ध की विभीषका का दुष्परिणाम कई नस्लों तक झेलेगा इस धरती का इन्सान
--रोशी 

 


होली के रंग ,गुझियों की सुगंध ,भंग की तरंग
मस्ती का खुमार ,मोहब्बत बेशुमार ,होली का त्यौहार
गिले शिकवे भुला दुश्मन को गले लगाने का त्यौहार
अबीर -गुलाल के बेहतरीन रंग ,टेसू के फूलों के संग
राधा संग खेलें होली कुंवर कन्हाई ,एक दूजे के संग
--रोशी

 


बासंती मौसम फिज़ा में भर देता है अद्भुत रंग सुदीप्त
शीतल बयार तन-मन को कर देती आल्हादित
सुप्त पड़ गयी भावनाएं अचानक हो जाती हैं जागृत
शीत लहर का प्रकोप जीवन की रफ़्तार को कर देता है संकुचित
ढर्रे पर वापस लौटती जिन्दगी ग्रीष्म ऋतू का कहर झेलने को लौटती
परिवर्तन जीवन का शाश्वत नियम है ,ख़ुशी-ख़ुशी दुनिया इसको झेलती
--रोशी

 


घर से बाहर कंहीं भी जाओ पर दिमाग में हर वक़्त घर रहता है
बेहतरीन पकवान कितने भी खाओ पर पेट घर की रोटी से भरता है
दुनिया के नज़ारे आँखों को बेशक ठंडक देते हैं पर सुकून घर पर मिलता है
घर की ड्योडी में घुसते ही मन को अजीब ठहराव सा महसूस होता है
किराए की छत्त वो पुरसुकून नींद कहाँ दे सकती है जो चैन घर में मिलता है
आवोहवा बदल जाती है जरूर बाहर निकलकर पर ताजगी घर ही दे सकता है
--रोशी

 


हर मुश्किल में मुस्कराना जानती है नारी
मुश्किल वक़्त में सो मर्दों पर भारी है नारी
धेर्य ,सहनशीलता की मूरत है सदेव नारी
कान की कच्ची और चुगलबाज़ी में आगे है नारी
ममता की मूरत और वात्सल्य की पहचान है नारी
सौदर्य से ओतप्रोत है नारी सहस्त्रों गुणों की खान है नारी
विश्व पटल पर अनेकाएक अद्भुत विशेषताओं की पहचान है भारतीय नारी
--रोशी

 


विद्ध्ध्वंस तय है ,उलटी गिनती चालू है
बर्बादी ,खौफनाक नज़ारे दिल चीर देंगें,तय है
पूरा विश्व युद्ध की विभीषका में जल रहा है
इंसानियत शर्मसारऔर भविष्य में अंधकार दिख रहा है
अनाथ बच्चे ,विधवाएं रोती-कलपती माएं दिखेंगीं दोनों तरफ
ईरान ,अमेरिका युद्ध को बेक़रार ,अनजान हैं मानवता की तबाही पर
वीरान सडकें,आग से घिरे घर ,तड़पते -कलपते बच्चे दिखेंगे सर्वत्र
परमाणु युद्ध की विभिषका झेलेंगी आने वाली नस्लें विश्व युद्ध की हर ओर
--रोशी 

 


परिवार के साथ देशाटन भर देता जीवन में रंग
कुछ लम्हे सुकूनके ताजगी ले आते दोस्तों के संग
मुट्ठी भर सुनहरी धूप की चमक दमका देती सम्पूर्ण काया
इठलाती समुद्र की लहरें तरोताजा कर देती जीवन की धारा
चाँद की रोशनी में रेत पर टहलना भर देता अद्भुत रोमांच
ज्वार-भाटा की तूफानी लहरें दिखाती अपने रौद्र रूप का दंश
प्रकृति के अद्भुत नज़ारे कुछ लम्हों को सम्मोहित कर देते हैं
जिन्दगी की आपाधापी के पल दोस्तों के साथ भुला बैठते हैं 

 

मकर संक्रांति के बाद मौसम का परिवर्तन निश्चित है
ग्रहों की दिशा का बदलाव होता है शास्त्रों के अनुसार ,पक्का है
इस बरस शायद कुछ भूल -चूक हो गयी है ईश्वर के खाते में
शीत लहर का प्रकोप कम होता ना दिख रहा इस मौसम में
कोहरा छटने का नाम नहीं ले रहा,कहर बरपा दिया इस मौसम में
त्राहि -त्राहि मच गयी है हाड़ गलाने वाली शीत लहर से सर्वत्र
सृष्टि काँप उठी है इस भयानक त्रासदी से,रहम मांगते हाथ जोड़कर
--रोशी

 


अपने मनमुताबिक चाहते हैं कि बच्चे चलें
उचित है यह, पर उनको अपने डग भरने दो
कब तक पकडे रहोगे डोर अपने हाथ में
खुले आकाश में उनको भी कभी उड़ने दो
तजुर्बा सिखाएगा कितनी और कैसे उड़न भरनी है
गिद्धों ,चीलों से बचना खुद सीखने दो ,पंख पसारना आयेगा
गर चलाते रहे हाथ थामकर तो धरती के शिकारिओं से कौन बचाएगा
--रोशी

 

जिन्दगी के ख्वाब संजोने में नहीं है कोई बहुत अच्छाई
हसीन लम्हों को वर्तमान में जीने में नहीं है कोई भी बुराई
जिन्दगी में हैं ढेरों पेचीदगियां ,जो मन में है कर गुजरो
सांसों का नहीं है कोई भरोसा हर पल अपने वास्ते जी लो
पल में तोला,पल में माशा आधुनिक जीवन की यही है सच्चाई
झट से वारंट मेल कर देता है,रब ने भी सुपर कंप्यूटर की नीति अपनाई
--रोशी

 


माँ,आपको गए पच्चीस बरस हो गए ,हम आपको आज भी महसूस करते हैं
घर के हर कोने में है आपका वजूद ,आपकी खुशबू आज भी महसूस करते हैं
रसोई में ,आँगन में ,फुलवारी में, छत में ,चौबारे में हर कोने में है आपका अस्तित्व
साड़ी में आती है आपकी खुशबू ,कानों में गूंजती है आपकी आवाजें भरपूर
मां के बगैर घर अधूरा लगता है ,मां जैसा लाड़-दुलार दुनिया में कंही ना मिलता है
मां से माएका शब्द उपजा है जीवन के आवागमन का दुःख सबके हिस्से आता है
--रोशी 

 


पिछले बरस का आकलन करें क्या खोया,क्या पाया ?
खुद से बेहतर और कोई ना कर सका तुमने है क्या गंवाया
सीखने को भी बहुत कुछ मिला ,दुनियादारी ने बहुत कुछ सिखाया
जीवन के बीते बरस ने है सबको खट्टे -मीठे अनुभवों से रूबरू कराया
सबको मिले कुछ नए रिश्ते ,कुछ पुराने रिश्तों को भी है सभी ने गंवाया
जीवन चक्र अनवरत है निरंतर चलता ,इसने हमको है बहुत कुछ सिखाया
--रोशी

 


यूं अचानक से सांसे साथ छोड़ रही हैं ,सुनकर दिल घबराता है
अचानक से उपरवाले का वारंट कब किसके लिए कट जाता है
सांसे और घुटने कब साथ छोड़ दें ,अनजान हैं सब पता नहीं किसी को
अशक्त शरीर ,बेजान पैर ,सिलसिला हो गया है यह आम हर किसी को
दिनचर्या में बदलाव ,खानपान ,जीने का नज़रिया बदल गया है सभी कुछ
उपरवाले ने भी अपने वारंट भेजने के तरीके में फेरबदल कर दी सब कुछ
--रोशी 

 

घर के बुजुर्गों को जीते जी इज्ज़त और औलाद का कीमती वक़्त चाहिए
एक कमरा और दो वक़्त की रोटी ,दवा और नाममात्र का सामान चाहिए
उम्र बदने के साथ रुपया -पैसा ,ज़मीन जायदाद उनको कुछ भी ना चाहिए
फलता फूलता परिवार,नाती -पोतों की आँगन में किलकारी बस जीने को चाहिए
बेशुमार व्यंजन ,बेशकीमती लिबास ,उम्र के साथ इच्छाएं भी अब हो जाती हैं कम
उनको क्या चाहिए नज़र उठाकर कभी देखते भी नहीं उनकी जिन्दगी में हम
श्राद्ध में मनपसंद व्यंजन ,वस्त्र बांटे, जीते जी उनको अपनी पसंद परोसते रहे
माता पिता क्या पहनेगें ?बस सदेव हम उन पर अपनी ही पसंद थोपते रहे
जीते जी बुजुर्गों को इज्ज़त अपना कीमती वक़्त गर दिया होता हमने कभी
रूह से निकलती दुआओं का जखीरा भरपूर होता आज हम सबके पास अभी
--रोशी 

  तिनका -तिनका जोड़ चिड़ा-चिड़िया घरोंदा हैं बनाते हफ़्तों गुजार देते बारी-बारी अण्डों को सेने में वक़्त वो गुजारते मीलों उड़ान भर दाना चुग -चुग ह...