बेटियों को ताकीद कर दी जाती है ,मेहमान हैं वो पीहर में
समझौता ,सहनशीलता की घुट्टी ठूंस दी जाती है उनकी रगों में
दर्द ,तकलीफ शायद नियति ही बन जाती है बचपन से जीवन में
परिवार ,समाज के जुल्म के खिलाफ आवाज घौंट दी जाती है छुटपन में
शौक,खुशियाँ अब मिलेंगी तुझको सिखाया जाता है रोज़ हर लम्हे में
ससुराल का ख्वाब मिनटों में भरभरा जाता है जब रखती बिटिया कदम ससुराल में
जायदाद से रहती महरूम उम्र भर,रात दिन खटने की जिम्मेदारी उसके पाले में
उम्र गुजार देती इसी जद्दोअहद में कौन सा घर है उसका ससुराल-पीहर दोनों में
--रोशी
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