शनिवार, 9 मई 2026

 


घर से बाहर कंहीं भी जाओ पर दिमाग में हर वक़्त घर रहता है
बेहतरीन पकवान कितने भी खाओ पर पेट घर की रोटी से भरता है
दुनिया के नज़ारे आँखों को बेशक ठंडक देते हैं पर सुकून घर पर मिलता है
घर की ड्योडी में घुसते ही मन को अजीब ठहराव सा महसूस होता है
किराए की छत्त वो पुरसुकून नींद कहाँ दे सकती है जो चैन घर में मिलता है
आवोहवा बदल जाती है जरूर बाहर निकलकर पर ताजगी घर ही दे सकता है
--रोशी

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