घर से बाहर कंहीं भी जाओ पर दिमाग में हर वक़्त घर रहता है
बेहतरीन पकवान कितने भी खाओ पर पेट घर की रोटी से भरता है
दुनिया के नज़ारे आँखों को बेशक ठंडक देते हैं पर सुकून घर पर मिलता है
घर की ड्योडी में घुसते ही मन को अजीब ठहराव सा महसूस होता है
किराए की छत्त वो पुरसुकून नींद कहाँ दे सकती है जो चैन घर में मिलता है
आवोहवा बदल जाती है जरूर बाहर निकलकर पर ताजगी घर ही दे सकता है
--रोशी
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