अंत तो निश्चित है युद्ध का पर कब यह ना सुनिश्चित है
अहम् ,वर्चस्व ,बदनीयती का खेल है सारा ,पर विनाश निश्चित है
टूटी इमारतें ,ध्वस्त खँडहर में तब्दील शहर ,सिसकती बची नस्लें
आबाद करने में लग गए जिसको बरसों चंद लम्हों में सिमट गयीं सांसें
फक्र था जिनको अपनी रवायतों,परम्पराओं और अपनी बादशाहत पर
अक्लऔर काबिलियत का इस्तेमाल किया दुनिया ने सिर्फ प्रकृति के विनाश पर
क्या बचेगा युद्ध के बाद इस धरती पर ?अनाथ बच्चे ,बिधवाएं,नेस्ताबुत जमीन
युद्ध की विभीषका का दुष्परिणाम कई नस्लों तक झेलेगा इस धरती का इन्सान
--रोशी
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