शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

                            अफगानी औरतें



अफगानिस्तान की सरजमीं पर बची हुई बेबस औरतें
जिनको छोड़ गए दोज़ख में मरने को ,बेसहारा और रोते- रोते
जिनका बेनूर ,मासूम चेहरा ,आँखों में दहशत बयां करती उनका दर्द
अंजान सा जिनका मुस्तकबिल ,हर सांस घुटती ,और डर से होता चेहरा सर्द
मासूम कलियाँ जो खिलने से पहले ही नोच डालीं ,,किरच -किरच होता उनका बचपन ...
चड़ गया आतंक की बलि,आततायीऔं से बचाने को परेशान माँ का सारा जीवन
जहाज में होने को सवार सिर्फ मर्द ही दिख रहे थे हवाई- अड्डे पर ,ना दिखती थी कोई औरत
क्या मरने को छोड़ आए माँ -बहनों को ,और बचा ली सिर्फ अपनी जान
क्या होगा अगली नस्ल का जब औरत का ना रहेगा नामों- निशां
कुछ औरतों को अफगानी छोड़ भागे बचा कर अपनी -अपनी जान
बची नस्ल को रौंदा तालिबानीयुओ ने ,मानो मिटा देंगे नारी की आन
कुछ तो रहम करो और सोचो जब रहेगी ना औरत जात इस देश में
तो किस पर करोगे हकूमत ,और कहाँ से लाओगे आतंकी ?
क्योंकि नस्ल तो अपने हाथों से दफन करते जा रहे इस देश के वासी और आतंकी

सोमवार, 7 सितंबर 2020

वैलेटाइन दिवस

दुनिया मना रही है वैलेटाइन दिवस
प्रेम- प्रदर्शन करने का सुन्दर दिवस 
सिर्फ एक ही दिन क्यो इस प्रेम के लिए 
364 दिन भी क्या कम हैं इस भाव के वास्ते 
सिर्फ झूठी मोहब्बत का दिखावा थोथा प्यार 
बस यही कुछ बचा है सिक्का जमाने को आज के बास्ते
मीरा का प्रेम ,राधा का प्रेम .सीता और सावित्री का प्रेम 
सब भूला बैठे और अपना ली पाश्चात्य शैली दिखाने को प्रेम
जिसकी ना है कोई नीव, ना कोई मंजिल ना ही है कोई भविष्य 
 विदेशी मनाते हैं ,तो हम क्यों रह जाए पीछे हैं आज के युवा मानते
हमारी सभ्यता में तो प्रेम के हैं ढेरो रूप ,विखरे पडे है उनको ना देखते
माता- पिता ,भाई - बहन, पति-पत्नी ,नानी-दादी बुआ-मौसी
अनेको और अद्भुत हैं रिश्ते और हैं अनेको उनके रूप
किसी से भी ,कहीं पर भी ,निभा सकते हैं लुटाकर प्यार भरपूर 
 365 दिन भी कम पड़ेंगे गर बदला नजरिया पाओगे प्यार खुद भी भरपूर

 माँ की सीख



 

मेरी तो दुनिया है मेरे बच्चो में ,घर में ,अपनों में 

वो सब है तो दुनिया ही हर ख़ुशी है कदमो में 

छोटा सा घर , जहाँ हो सारे जहाँ की खुशियाँ यही चाहा था मैंने 

ना थे ऊँचे सपने ,ना ही ऊँची उडान पैर थे ज़मीं पर अपने 

शायद यही  घुट्टी दी थी माँ ने बचपन में हमको 

चादर देख ही पावं फैलाना अपने बिटिया, ना अनुसरण करना सबको

अपने बच्चो को भी सदा यही  घुट्टी पिलाई थी हमने 

चले थे अब तक जिस राह पर वही राह दिखाई थी उन्हें हमने

जिन उसूलो का दामन थामा था हमने वही थे आजतक हमारे अपने     

 

                                    रोशी

 

 

ठहराव

समुद्र की उफनती लहरें,अगाध जलराशि ने कर दिया था सबको स्तब्ध 
 विस्तृत रेतीले तट बस काफी थे देखने को एकटक 
दिखता ना था कोई छोर लहरें बस कर रही थी मन को तरंगित 
कितना कुछ समेटे है भीतर ,पर फिर भी हैं शांत,स्थिर
 ढेरो उतार चढ़ाव झेलता है हर पल ,अनगिनत राज़ समेटे है भीतर 

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

पुनर्जन्म ......
बन्द खिड़की का पट खुला 
मानो जिंदगी को मिली नई उडान
क्योंकि उसका शरीर था निष्क्रिय
  कल्पना को उसकी मिले   नए रंग
अम्बर नीला ,बादल सफ़ेद  बिखरे थे चहुं ओर बहुरंग 
कैसा अम्बर ,कैसा बादल और कैसा इन्द्रधनुष  का है रंग ?
सोचती ही रही  थी  जो इतने बरसों से .आज भर उठे जीवन  में  सप्त रंग |
तन का रंग तो सबने खूब धोया पर ह्रदय में ना झांक पाया कोई
काया बना ली कोरी अपनी पर आत्मा और दिल ना बदल पाया कोई
आतंक,दहशत ,जुल्म ,झूठ ,फरेब के पक्के रंगों  से आत्मा है  सरोवार
काश हम देख पाते झांक कर अंतस में अपने ,काया को निर्मल किया होता एकबार 
  होली के रंग विखराते अद्भुत घटा  और ना होती होली बदरंग
खुद भी मनाते पावन त्योहार ,दुनिया को प्यार के रंग से करते सरोबार 

बुधवार, 26 अगस्त 2020

माँ
माँ तो ईश्वर से प्राद्त्त अनुपम सौगत होती है
गर्भ से लेकर जीवन पर्यत बालक को अपना सर्वस्व देती है
बालक  मुसकाए तो माँ खिलखिलाए, कदाचित रोए तो खून के आंसू रोती है
बालक पर  सर्वस्व न्यौछावर  और उसके इर्द गिर्द ही अपनी दुनिया बुन लेती है
नित नूतन सपनो का जाल, माँ शिशु के वास्ते बुन लेती है
बालक की आँखो से ही माँ सारे ब्रह्माण्ड है देखती
तोतली जुबां से सारी भाषाएँ गुनती और समझती है 
 माँ को  करते  नमन  देवता  और   दुनिया भी सलाम करती है
सिर्फ एक दिन ही उस माँ के लिए दुनिया मदर्सडे मनाती  है 
साल के 365 दिन भी हैं कम ,मगर दुनिया उसकी एहमियत  माँ के कूच कर जाने के बाद समझती है 

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...