जिन्दगी ने बहुत कुछ था हमको सिखाया
ना थे हम ज्ञानी ,ध्यानी और ना ही किया बहुत चिंतन
धोखे ,विश्वासघात और खंजर क्या- क्या ना पाई तडपन
धोखे ,विश्वासघात और खंजर क्या- क्या ना पाई तडपन
अब जाकर समझ आई हमको इन्सान की असली पहचान
जब कीड़े ,मकोड़े ना बदल सकते कुदरतन अपना स्वभाव
चोट पहुचना ,डंक मारना उनका इश्वर प्रदत्त है स्वभाव
हम इन्सान होकर क्योँ भूल जाते है सबका विचित्र स्वभाव
सारी जिन्दगी उसको अनुकूल बनाने में ही लगा देते हैं
परेशां ,दुखी ,अवसादग्रस्त और बेचैन फिर हम होते हैं
क्योँ ना रहे दूर और ना लाये होते उसको दिल के करीब
विष वमन,कपट ,छल,द्वेष ,और जलन शायद यह ही था उसके करीब
समझाया था दिल को हमने कि शायद वक़्त ने बदल दिया हो उसका व्यव्हार
पर व्यर्थ ,निरर्थक थी हमारी सोच जो ना देख सकी दिल के आर पार
जब कीड़े ,मकोड़े ना बदल सकते कुदरतन अपना स्वभाव
चोट पहुचना ,डंक मारना उनका इश्वर प्रदत्त है स्वभाव
हम इन्सान होकर क्योँ भूल जाते है सबका विचित्र स्वभाव
सारी जिन्दगी उसको अनुकूल बनाने में ही लगा देते हैं
परेशां ,दुखी ,अवसादग्रस्त और बेचैन फिर हम होते हैं
क्योँ ना रहे दूर और ना लाये होते उसको दिल के करीब
विष वमन,कपट ,छल,द्वेष ,और जलन शायद यह ही था उसके करीब
समझाया था दिल को हमने कि शायद वक़्त ने बदल दिया हो उसका व्यव्हार
पर व्यर्थ ,निरर्थक थी हमारी सोच जो ना देख सकी दिल के आर पार
रोशी अग्रवाल
6 टिप्पणियां:
बहुत सही लिखा है आपने !
आभार !
बिल्कुल सही और सटीक बात कहा है....
सुन्दर प्रस्तुति, बधाई.
सुन्दर प्रस्तुति, बधाई.
बहुत सुन्दर लिखा आपने
सच कहा है ... इंसान हमेशा दूसरों अनुसार करना चाहता है ... पर पछताता भी है ...
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