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गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

दरकते रिश्ते


ये दुनिया के रिश्ते भी  bare    होते हैं अजीब
कभी रुलाते ,कभी हसाते ,होते हैं जो उनके करीब
पर लगता है कुदरत ने कुछ ज्यादा ही गम भर दिए उसके पास
क्यूँ ?आखिर क्यूँ ? जिसको भी चाहा इस कमबख्त दिल ने
पराया फ़ौरन कर दिया उन सभी उसके अपनों ने
आखिर क्यूँ नहीं ?हम समझ पाते दुनिया का फलसफा
यहाँ तो हर वक़्त चलता है जोड़ ,घटाने ,गुना और भाग का चक्कर
जब जैसे चाहा रिस्तो में भी अंक गरित का हिसाब लगाया
दिल ,रिश्ते ,सम्बन्ध सब कुछ तौल लिए तराजू पर
जो संस्कार ,प्यार ,मोहब्बत सिखाये थे माँ ने
उनकी तो अब कोई एहमियत ही न थी अब जिन्दगी में
पर अब यह तो सब पुरानी बेमानी बातें ,अब इनका न कुछ फायदा
पड़ने में ,किताबो में ,फिल्मो में ही रह गया है बस इनका अस्तित्व
मानवीयता तो दरक रही है ,यूँ कहें सिमट गयी है इस युग में