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शनिवार, 21 जनवरी 2012

मकर संक्रांति


आज थी मकर संक्रांति और था मांगने वालों का रेला
तभी नज़र पड़ी  कोने में कड़ी था एक वृद्ध अकेला
पास बुलाया और पुछा बाबा क्या चाहिये ?
बोला कुछ नहीं बस दुआएं दिए जा रहा था
वृद्ध काया ,पोपला मुह,शीतल वायु फटे वस्त्र उडाये जा रही थी
धीमे -धीमे रेंगते रेंगते सड़क पर बस घिसट रहा था
कहा बाबा घर से न निकला करो सड़क पर गिर जाओगे
बोला हम कहाँ निकलना चाहते है बेटा ,कमबक्त ये पेट नहीं मानता
न पत्नी ,न परिवार  न ही औलाद है हमारे पास
पर क्या करे बेटी घर पर नहीं वैठकर भर पता यह पेट
हमारे तो अब तुम सब बच्चे हो जिन्होंने न सोने दिया कभी भूखे पेट
 निशब्द रह गए थे हम उसका जबाब सुनकर
सब कुछ छीनकर भी प्रभु ने दिया उसको सबका प्यार

3 टिप्‍पणियां:

sangita ने कहा…

सार्थक पोस्ट है आपकी | कहीं रिश्ते होते हुआ भी लोग एकाकी रह जाते हैं तो कहीं सारा जहाँ ही अपनासा लगता है |

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रिश्तों को मजबूती मिले, घरों में प्रेम बढ़े..

Surinder Singh ने कहा…

God Bless...