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मंगलवार, 13 मई 2014

बचपन से ही ज्यादातर लड्कियौं को सिखा दिया जाता है
यह करो ,वो ना करो ,यहाँ जाओ .वहाँ ना जाओ .....
उनकी सोच ,उनकी समझने की शक्ति को कुचल दिया जाता है
उनके वस्त्र ,उनकी शिक्षा ,उनका घूमने -फिरने के दायरे पर
हम खींच देते हैं एक लक्ष्मन -रेखा ,जिसके भीतर सिमट जाते हैं उनके सपने
उनका जीवन बन के रह जाता है ,माफिक एक पर -कटे परिंदे के
जिसको रख देते हैं एक पिंजरे में ,और वक्त पर परोस दिया जाता है भोजन
क्योँ नहीं हम दे पाते हैं ?उनको एक स्वछंद वातावरण ,एक उन्मुक्त जीवन
काश हम सब दे पाते एक नीला ,सुंदर आसमां अपने पंख फडफडाने को
जिस गगन तले जब चाहें,जैसे चाहें अपने पंख फडफडाने को ......

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