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शुक्रवार, 24 अगस्त 2018





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राखी का पावन त्यौहार ,लाता है भाई -बहनों के अद्भुत नेह की सौगात
स्नेह्सुत्र को थामे करती है बहना ,ड्योडी पर भाई का इंतजार
भाई भी सूनी हथेली थामे ,मन है उसका भी हुलसता पाने को बहना का प्यार
दोनों का दिल पाखी सम मिलने ,को उड़ -उड़ जा पहुंचे एक दूजे के पास दूरी ने ,मजबूरी ने डालीं है पाँव में बेड़ियाँ ,आज तो हैं ही दोनों उदास
चलेगा जीवन कल अपनी गति से ,कल शायद ना रहेगा इस दुःख का एहसास
यह पर्व है अपने में समेटे ढेरों प्यार के रिश्तों का अतुल्य एहसास

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-08-2018) को "आया फिर से रक्षा-बंधन" (चर्चा अंक-3075) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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रक्षाबन्धन की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना