रविवार, 11 मई 2014

माँ

हर पल याद आता है वो माँ का निश्चल प्यार -दुलार
वो दांत-फटकार ,वो उलहाने ,आँखों में समाया था उनके छोटा सा संसार
हर घडी उनका रोकना -टोकना लगता था तब कितना निरर्थक
पर आज यूं लगता है जीवन हुआ है उन सीखों से कितना सार्थक
अप नी पीड़ा ,दुःख ,तकलीफ का ना होने दिया कभी एहसास
बस बच्चे ही थे उनकी दुनिया ,और वो रही सदा अपनी धुरी के आसपास
आवाज़ से ही जो जान लेती है बच्चों की पीड़ा ,और ईश्वर से जो मांगे औलाद के गम
अपने दामन में भरने को..... संसार में सिर्फ कर सकती है  सिर्फ माँ ,माँ और माँ

गुरुवार, 8 मई 2014

घरोंदा

घर के आँगन में रखे छोटे पेड पर देखी कुछ ज्यादा ही चहल-पहल
दो नन्ही खूबसूरत चिडियाँ का बढ़ गया था एक छोटे से बोनसाई पर
उत्सुकता बड़ी ,जाकर देखा बड़ा ही अद्भुत घोंसला बना लिया था चटपट दोनों ने
इतनी बेमिसाल कारीगरी से दोनों ने बनया था अपना नया आश्याना
छोटे छोटे तिनके संजोए थे दोनों ने पूरी शिद्दत के साथ अपने नए घरोंदे के वास्ते
तेज आंधी भी ना डिगा पा रही थी उनका अद्भुत घरोंदा ,ना हिला सका प्रचंड बारिश का वेग
एक या शायद बस दो दिन में ही बना लिया था दोनों ने वो घोंसला
आज दोनों पक्षी थे नदारद ,ना दिखी उनकी चहल-पहल
अचनक नज़र पड़ी तो देखी बैठी चिडया घोसले में अपने अण्डों के साथ
प्रकृति के कितने हैं अद्भुत रूप और रंग ............
प्रसव से मात्र एक या दो दिन पहले ही निकले थे दोनों चिड़ा-चिडया एक साथ
अब मात्र माँ ही अण्डों को से रही है ,कर रही है वो बालकों का इंतज़ार
चिड़ा अब है नदारद शायद किसी और दिशा में कर गया है पलायन
पर माँ को तो अब है इंतज़ार अपने नौनिहालों का .........

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

नन्ही बिटिया



जब गर्भ में थी बिटिया तो कभी ना आया ख्याल उस गुनाह का
क्यूंकर हम हत्या करने जा रहे थे मासूम जिंदगी की ,नन्ही कली की
क्योँ ना हुआ गुमा हमको एक पल भी उस मासूम का अस्तित्व नेस्ताबूत करते वक्त
जब -जब कोई पायल की सुनेंगे रुनझुन याद आयेगी यह ही बिटिया
रंगीन ओड़नी,सितारों से लकदक लहंगा देख रोयेगा मन इस बिटिया को याद कर
हाथों पर मेहँदी के बूटे सखियों के देख रुकेगी ना आंसूओ की लड़ी
नवरात्रों में जब ना होगी कोई कन्या आसपास पूजने को उसके पाँव
भाईओं की जब रहेगी सूनी कलाई ,ना दिकेगी कोई बहिन उनके आस -पास
माँ की पीड जो समझ लेती चुटकी बजाते पल -भर में ,
नन्ही कलाइयों में रंग -बिरंगी चूड़ी खनकाती ना  नज़र आएगी मासूम बिटिया
सुबह आँख खुली और सपना टूटा,और बच गए हम उस गुनाह से
जो करने जा रहे थे क्रूरतम पाप अपने हाथों से  

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

कन्या






कल नवमी पर गए थे मंदिर माता के दर्शन करने ,वहां देखा जगह -जगह भंडारे हो रहे थे और बड़ी चहल -पहल थी बड़ा शोर था  पास जाकर देखा तो कन्याओं के वास्ते लड़ाई हो रही थी क्यूंकि कुछ ही बच्चियां वहां पर नज़र आ रही थी और उनको लेकर खींचातानी हो रही थी ,उन कन्याओं को पूजा और भोजन वास्ते हर कोई अपने साथ ले जाना चाह रहा था  बच्चियां कह रही थी भूख नहीं है ,हम थक गए हैं पर आज तो उनके पैर छू -छू कर मनाया जा रहा था ......वाह रे विधाता क्या किस्मत लिखी है स्त्री जात की बस एह दिन मान -मनुहार अगले दिन ही तिरस्कार  आज भरपेट भोजन कल से ही अत्याचार ,यूं ही सिलसिला चलता रहा भ्रूण -हत्या का ,बहुओं को यूं ही जलाते मारते रहे ,लड्कियौं की अस्मत  यूं ही पाँव तले रौंदते रहे तो वो दिन दूर नहीं कि हिन्दुस्तान के स्थान पर विदेश जाना होगा बहु लेने .....   कई राज्यों में तो विवाह हेतु कन्याओं कीबहुत कमी हो गयी है ...........

शनिवार, 8 मार्च 2014

अपने -पराये





यह जिंदगी के चक्र का अजीब फलसफा है
कभी यह शीर्ष पर तो कभी गर्त में गिराता है
शीर्ष पर सुख और गर्त में घनघोर सताता है
काश ,हो जाये कुछ ऐसा कि चले मनमाफिक वक्त का पहिया
अपनों और गैरों की पहचान यह वक्त का पहिया ही कराता है
यूं तो सब अपना दिखाने का करते हैं हर वक्त ढकोसला
पर रंगें सियारों की पहचान तो यह ही कराता है


गुरुवार, 6 मार्च 2014

नवयुगल


यात्रा में मिला एक नवयुगल ,प्रेमरस से जो था सरोबार
पूरे रास्ते जो खींच रहा था सबका ध्यान अपनी ओर बार -बार
अभी- अभी जो लौट रहे थे शायद हनीमून से अपने घर- बार
ट्रेन में सारे रास्ते करते जा रहे थे असभ्यता बार -बार
यूं सारे राह ना उनका स्नेह प्रदर्शन भा रहा था किसी भी सहयात्री को 
जैसे ही निकट आया उनका स्टेशन पत्नी के रंग बदले बार -बार
पति पर चीखी की उतारो सूटकेस और निकालो सामान तत्काल
नौकर की भांति लपका वो और रखा सूटकेस उसके चरणों में तत्काल
निकला चूड़ी का डिब्बा और पहना चूडा ,सजा ली कलाई उसने
दी सिन्दूर की डिब्बी पति के हाथ ,हुकुम साथ भरने को गहरी मांग
लगाने को कहा बिंदिया माथे पर ,ना था कोई शीशा उसके पास
पर्स से निकाले बिछिया , और नेलपालिश सजाने को हाथ -पाँव
झट तैयार हो गयी वो नव व्याहता .देखे सबने उसके रंग हजार
क्या वो बिच्या ,मांग सब पति प्रेम का प्रदर्शन था?
या सास का डर उसको कर रहा था मजबूर इस नाटक को करने को
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गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014




हे त्रिपुरारी जब ,जब प्रथ्वी पर असुरों का आतंक छाया है ,दानवों ने कोलाहल मचाया है आपने सदेव तीसरा नेत्र खोलकर इन राक्षसों को भस्म किया है ,प्राणिमात्र की सदेव रक्षा की है ....जागो और अपने भ्रमास्त्र का सदुपयोग करो यह धरती पापों के दावानल तले गर्त में जा रही है आतंकी ,बलात्कारी .झूटे ,मक्कार जैसे सैंकडों दानवों ने अपना सर्वस्व साम्राज्य फेला लिया है ....जागो शिवा जागो

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...