बचपन से घर में भी अतिथि का स्वागत और सत्कार देखती आयींमौसी, भाभी ,चाची और बुआ का भी सपरिवार घर पर आना
बच्चो का भी धमाल, कूदा-फांदी और जमकर शैतानी मचानासभी रिश्तेदारों का मिलजुल कर काम में हाथ बंटाना
सारे बच्चो का आपस में झगड़ना और रूठना-मनाना
माँ और मौसी की आपसी गपशप और चहकना-फुदकना
आज कितनी बदल गई है ''अतिथि देवो भव:" की परिभाषा
अतिथि भी अब मेहमान नबाजी का मजा उठाना चाहता है भरपूर
आता है वह अपने घर से थका हारा- भूखा प्यासा पूरा ही मेहमान बनकर
हर सुविधा का पूरा लुफ्त उठाना चाहता है पूरा मेहमान बनकर
और रात्रिकाल में चाहिए अतिथि को आदर,सम्मान और किसी के घर अतिथि बनकर
जो कर देती हैं घर बालों की नींद हराम, सुख-चैन, सुकून हो जाता है काफूर
सारी परिभाषाएं बदल गईं है,और बदल गयें हैं "हम और आप"
हम अपनी मानसिकता बदलकर क्यों नहीं गढ़ते
एक नया समाज जहाँ हो "सिर्फ और सिर्फ प्यार"
जहाँ हम करें मेहमान का इन्तजार और वो पाय हमसे ढेर सा "प्यार प्यार प्यार" ....
जो कर देती हैं घर बालों की नींद हराम, सुख-चैन, सुकून हो जाता है काफूर
सारी परिभाषाएं बदल गईं है,और बदल गयें हैं "हम और आप"
हम अपनी मानसिकता बदलकर क्यों नहीं गढ़ते
एक नया समाज जहाँ हो "सिर्फ और सिर्फ प्यार"
जहाँ हम करें मेहमान का इन्तजार और वो पाय हमसे ढेर सा "प्यार प्यार प्यार" ....
रोशी अग्रवाल
6 टिप्पणियां:
हम अपना ही दायरा समेटते जा रहे हैं।
आज की तो मानसिकता है कि अतिथि कब जाओगे..पहला जैसा प्यार, सत्कार और अतिथि देवो भव की भावना कहाँ है..सुन्दर प्रस्तुति
Right U are.
आतिथ्य सत्कार की परम्परा ही खो गयी है.....
"हम अपनी मानसिकता बदलकर क्यों नहीं गढ़ते
एक नया समाज जहाँ हो "सिर्फ और सिर्फ प्यार"
जहाँ हम करें मेहमान का इन्तजार और वो पाय हमसे ढेर सा "प्यार प्यार प्यार"
बहुत सुन्दर बात कही है आपने
bilkul sahi kaha
aajkal kaun apne ghar atithi chaahta hai ?
wo apnapan gaayab hi ho gaya
sundar post
aabhaar
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