सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

लाचारी और बेबसी



देखा कल राह में एक अद्भुत नज़ारा
एक बूढा ,क्रश्काए शरीरसे लाचार था बेचारा
ठेले पर था सजाये कुछ छोटी -मोटी चीज़ों की दुकान
जो थीं उस गरीब की रोज़ी -रोटी का सामान
ठेले को हाथ जोड़कर चूम रहा था बार -बार
बुदबुदा रहा था कोई मंत्र मन में बार -बार
क्योंकि रोज सांझ को घर का चूल्हा जल पाता है सिर्फ
उसकी दिन भर की कमाई से ,चलता है घर- परिवार
जैसे करते हैं पूजा -इबादत बड़े-बड़े सेठ साहूकार अपने प्रथिष्ठानों की
वो गरीब भी कर रहा था उतनी ही इबादत अपने थोड़े से सामान की
आँखों में ढेरों सपने सजा कर बड चला वो अपनी मंजिल की ओर
पत्नी और बच्चे भी देख रहे सूनी आँखों से उसको जाते दूर 

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