बरसो बाद आज मिली वो मुझको जो थी भुला दी मैंने
बीमार, असहाय , मानसिक अवसाद से त्रस्त थी वो जो देखा जाना आज मैंने
हँसना, मुस्काना, खिलखिलाना गई थी वह सब कुछ भूल लगभग
बुत सरीखी प्रतिमा लग रही थी वो मुझको, जान थी थोड़ी बची शरीर में लगभग
स्वर्थी, शराबी, पति को गई थी वो व्याह जानते बूझते गरीब माँ बाप ने
बच्चो का जीवन संवारने में ही जिंदगी गुजार दी थी पूरी उसने अब मुझको
किसी भी प्रश्न का उत्तर देने में संकोच होता था उसको
जी रही थी बगैर साँस के , चल रही थी बगैर आस के बेखबर, बेध्यान
घर, परिवार की इज्जत की खातिर कर दी है जीते जी जिंदगी उसने अपनी कुर्बान.....





