क्यूंकि गवां चुकी हूँ ठेरों रिश्ते मिले ना वापिस जिनको
पहले खोया माँ को न पा सकी दुबारा उनको
फिर टूटा घर परिवार जिन पर था नाज़ मुझको
माँ क्या गईं, सारे रिश्ते भी उनके साथ बिखर गए
सगे, सम्बन्धी और रिश्तेदार सबके रंग ही बदल गए
ना रहा कोई रिश्ता- नाता पक्का और मजबूत सब सरक गए
सारे के सारे चेहरों के परदे खुद व खुद उतर गए
हमने तो बहुत चाहा निभाना पर हम थे बहुत मजबूर
बदलते रंग, दरकते रिश्ते दिल हुआ चूर - चूर
सगे, सम्बन्धी और रिश्तेदार सबके रंग ही बदल गए
ना रहा कोई रिश्ता- नाता पक्का और मजबूत सब सरक गए
सारे के सारे चेहरों के परदे खुद व खुद उतर गए
हमने तो बहुत चाहा निभाना पर हम थे बहुत मजबूर
बदलते रंग, दरकते रिश्ते दिल हुआ चूर - चूर
2 टिप्पणियां:
आखिर क्यूँ खोते हैं ये रिश्ते ?
अंतस को झकझोरती हुई बेहतरीन रचना....
mom u have written ur entire life in front of us in just few words..there is so much pain in u which none of us realise...mom v all take strength from u ...love u lots...
एक टिप्पणी भेजें