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सोमवार, 9 जुलाई 2012

बदलती वयार

बिसरा दिया है मेघों ने भी सावन में बरसना
सावन के झूले भी अमुआ की डार पर ना दिखते हैं अब 
बच्चियो की मस्ती ,मेहँदी के पत्तों पर आपसी खटपट 
सब हो गयी हैं शायद गुजरे ज़माने की बातें  अब 
ना कानों में पड़ती है किसी भी गलियारे से चूडियो की खनखनाहट 
वो मेहँदी से रची हथेलियाँ अब ना दिखती हैं गावं ,कस्बो में 
शायद बढता स्कुल ,आफिस का दबाब दबा रहा है पुरानी परम्पराएं 
सुहागिनों का नैहर भी छूट रहा है त्यौहार पर जाने से 
परंपरा अनुसार तीज पर बाबुल घर लाये और भाई राखी बंधवा कर ससुराल पहुचाये 
 बदल गए हैं सब मायने वक़्त ,सहूलियत के अनुसार त्यौहार मनाने के 
अब कौनसा नया परिवेश बदल देगा सारे के सारे ख़ुशियों के पैमाने 

3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अपना परिवेश स्वयं ही बनाना पड़ेगा हम सबको..अपनी संस्कृति स्वयं ही लानी पड़ेगी हम सबको।

संध्या शर्मा ने कहा…

हमें ही वापस लाना होगा उन परम्पराओं को जिन्हें हमारी नयी पीढ़ी भूलती जा रही है...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सच कहा आपने....सार्थक सन्देश