अभी अभी देखि जाते किसी विधवा बूढी माँ की अर्थी
जब तक जिंदा रही वो तड़पती रही सिसकती रही
पति को जो जवानी में थी खो चुकी पर बेटे के सहारे जीती रही
मरियल काया, सफ़ेद साड़ी, समाज के भेड़ियों के बीच जिंदा रही
किस तरह से काटा होगा दिन और कितनी भयावह होगी उनकी रातें मैं सोचती रही
पुत्र प्रेम में वो जीती रही, पुनः पुनःहर रोज़ पल पल मरती रही
पुत्र भी न निकला कम पर अब पुत्रवधु के सपने थी संजोती रही
पुत्रवधु भी थी आधुनिक, उसके अपने पुत्र के साथ सास का दम घोटती रही
जितना दुःख विधाता ने लिखा था उसकी फूटी किस्मत में सभी सहती रही
पर आज हो गयी सब बंधनों से आज़ाद, आत्मा उनकी निर्वाण को प्राप्त हो गयी
रोशी अग्रवाल





