गुरुवार, 22 सितंबर 2011

जर्जर काया






अभी अभी देखि जाते किसी विधवा बूढी माँ की अर्थी 
जब तक जिंदा रही वो तड़पती रही सिसकती रही 
पति को जो जवानी में थी खो चुकी पर बेटे के सहारे जीती रही 
मरियल काया, सफ़ेद साड़ी, समाज के भेड़ियों के बीच जिंदा रही 
किस तरह से काटा होगा दिन और कितनी भयावह होगी उनकी रातें मैं सोचती रही 
पुत्र प्रेम में वो जीती रही, पुनः पुनःहर रोज़ पल पल मरती रही 
पुत्र भी न निकला कम पर अब पुत्रवधु के सपने थी संजोती रही
पुत्रवधु भी थी आधुनिक, उसके अपने पुत्र के साथ सास का दम घोटती रही 
जितना दुःख विधाता ने लिखा था उसकी फूटी किस्मत में सभी सहती रही 
पर आज हो गयी सब बंधनों से आज़ाद, आत्मा उनकी निर्वाण को प्राप्त हो गयी 
                                                                                      रोशी अग्रवाल 

अपने पराये

सभी आये,सभी ने सराहा ,कुछ ने मन से कुछ ने बेमन से 
अब कुछ कुछ पहचानने लगे है ,चेहरे कौन अपने कौन पराये 
दिखाते है ख़ुशी ,ढकते हैं जलन पर दिख ही जाते हैं फफोले चेहरे पर 
क्यूंकि चेहरा और आँखें ही तो आइना हैं अंदरूनी 
यह कमबख्त कितना भी छुपाओ राज़ खोल ही देते हैं 
सोचो ज़रा उस भगवन का करो शुक्रिया अदा
कितनी खूबसूरती से फिट किया है लाइ डेटेक्टर 
इन्सां को भी न पता 

माखनचोर


ब्रज का दुलारा है ,सखियन का प्यारा है
यशोदा की अंखियन का तारा ,,वो है हमारा
वृषभान दुलारी का प्राण-प्रिय ,नन्द का दुलारा है
वृज का रखवारा दुष्टों का तारान्हारा है ,
किन नामो से उसको पुकारे ना जाने यह जी हमारा है?  
गोवर्धनधारी ,गिरधारी ,माखनचोर और कृष्ण मुरारी 
असंख्य नाम है उसके ,सहस्त्र्रूप्धारी 

सोमवार, 12 सितंबर 2011

आतंकवाद

बम का धमाका करना, आतंक फैलाना  आज की पीढ़ी को 
कितना आसान लगता है, हमारे नौजवानों को 
उपर बैठे उनके आका, पथ-भ्रष्ट करते इंसानों को
कितनी मांगें होती हैं सूनी, कितनी कोखें हैं उजड़ती
ये रत्ती भर भी न होता है, महसूस  उन आतंकियों  को 
रोते- कलपते अनाथ बच्चे, अपनों को खोने का गम परिवारों का 
हिला भी न पाता है, आत्मा और जमीर हैवानो का 
कभी भी न सोच पाते, ना ही सोच पाएंगे ये बेदर्द दरिन्दे 
इन्सान कहना भी इंसानियत की बेइज्जती करना है, यह है खुदा के नेक बन्दे 
इन खूनी आतंकिओं की ना है कोई ,जात ना है बिरादरी 
ना है कोई अपना, ना है खानदान , ना ही  है कोई रिश्तेदार 
                                                 रोशी अग्रवाल 

शनिवार, 10 सितंबर 2011

दुखवा मै का से कहूँ ?

किसी भी  ख़ुशी में भी, डर लगा रहता है निरंतर  
नजर लग  जाती है फ़ौरन ख़ुशी में हर पल 
जब कभी पंख लगाकर उड़ना चाहा  हमने 
आसमा में ढेरो गिद्द-बाज मडराते नजर आये 
फ़ौरन उड़ना भूल घोसले में बसेरा कर लिया 
जब कभी चाहा आसमां में उड़ना और स्वच्छंद  चह-चाहना   
गंदे- भद्दे अनर्गल भाषण सुने कि जिव्हा भूल गयी बोलना 
जब कभी चाहा स्वच्छंद विचरण करना यहाँ और वहां 
इतनी बंदिशे, इतनी यंत्रनाये मिलीं कि चलना भूल गए 
जब चाहा खुल कर हँसना, बोलना बतियाना, तानों में उलझ गए 
बंद कर दी गई, जुबान कि शब्दों का अर्थ भूल गए....
आखिर लड़की जात को ही इतनी बंदिश क्यूँ है ? 
क्यूँ  आज भी समाज उनकी खुशियों पर अंकुश रखता है 
                                                रोशी अग्रवाल 

मन की बेचैनी

मन पता नहीं कहाँ रहता है ? 
हर बक्त कुछ दूंडता रहता है 
अबूझे सवाल पूछता रहता है 
हर पल आशंकाओ में घिरा रहता है 
कुछ बुरा न हो इसी दर में जीता रहता है 
क्यूंकि हो चुका है सब कुछ घटित बुरा उसके साथ 
अब और कुछ न हो इसी में डूबा रहता है 
क्या करे वो, कैसे संभाले इस दिल को 
कुछ भी न होता जबाब है उसके पास 
ये तो बस डरता रहता है, परेशा करता रहता है ..


हरियाली तीज

Pakistani Mehndi Designs
प्यासी धरती और  झुलसता  तन 
शीतलता देता है बरसता सावन 
हरियाली तीज आने को है सन्देश देता  है यह सावन
दूर देश बैठी बेटी का आने को है बेक़रार मन 
भैया को पीहर जाकर बांधुंगी राखी है यह बेचैन  मन 
जो न जा सकीं पीहर, ससुराल में हैं तड़पता उनका मन 
माँ भी संजोती थी सपने और जोहती थी  राह हर पल  
आती होगी लाडो, झूलेगी झूला, रचेगी मेहंदी घर में होगा हल्ला गुल्ला 
                                                                रोशी अग्रवाल 




























































  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...