सोमवार, 23 जुलाई 2012
रविवार, 22 जुलाई 2012
तीज का मनोहारी उत्सव ,
तीज का मनोहारी उत्सव ,भर देता है हर युवती के मन में कुछ अनूठी उमंग
साजन के प्यार में खिल उठता है उसका अंग और प्रत्यंग
सावन के झूले बड़ा देते हैं ह्रदय की उठती गिरती सांसो की सरगम
यह सतरंगी त्यौहार है ही हमारे देश की अद्भुत रीति -रिवाजों की शान
अल्हड ,बूढी और जवान सभी मनाएं इसको भिन्न -भिन्न रूपों में सजकर
धानी लहरिया ,की ओढ़ चुनर सजे गोरी पहन हाथ भर भर चूड़ी और पाँव सजे महावर
सोमवार, 9 जुलाई 2012
बदलती वयार
सावन के झूले भी अमुआ की डार पर ना दिखते हैं अब
बच्चियो की मस्ती ,मेहँदी के पत्तों पर आपसी खटपट
सब हो गयी हैं शायद गुजरे ज़माने की बातें अब
ना कानों में पड़ती है किसी भी गलियारे से चूडियो की खनखनाहट
वो मेहँदी से रची हथेलियाँ अब ना दिखती हैं गावं ,कस्बो में
शायद बढता स्कुल ,आफिस का दबाब दबा रहा है पुरानी परम्पराएं
सुहागिनों का नैहर भी छूट रहा है त्यौहार पर जाने से
परंपरा अनुसार तीज पर बाबुल घर लाये और भाई राखी बंधवा कर ससुराल पहुचाये
बदल गए हैं सब मायने वक़्त ,सहूलियत के अनुसार त्यौहार मनाने के
अब कौनसा नया परिवेश बदल देगा सारे के सारे ख़ुशियों के पैमाने
रविवार, 8 जुलाई 2012
वैदेही की व्यथा
वैदेही का तो हर युग मैं जनम ही हुआ है नारी जीवन का संताप भोगने वास्ते
कभी जन्मी वो जनकसुता बनकर और पाए घोर कष्ट भार्या राम की बनकर
जन्मी थी वो राजकुल में और व्याही भी गयी रघुकुल में सहचरी वो राम की बनकर
पांचाली भी जन्मी थी राजकुल में और पाया था अर्जुन सा राजकुमार स्वयंवर में उसने
पर वह री किस्मत ? विधि की लेखनी ने उल्टा दिया सारा का सारा किस्मत का लेखा -जोखा
व्याही एक पति को ,और भोग्या बनी पांच पतियौं कीकुदरत का खेल निराला
कितने ही किस्से ,कहानी भरी पड़ी है इतिहास में हमारे हर युग की वैदेही की
रूप अनेकों पर वैदेही तो हर युग ,काल में रही है सिर्फ भोग्या ,शापित और अबला
जब ,जैसे,जिस भी रूप में पाया है दारूण कस्ट उसने सदेव वैदेही रूप में जनम्कर
शनिवार, 7 जुलाई 2012
जिन्दगी की अजब कहानी
किस्मत से बढकर कुछ नहीं है मिलता देख लिया है जिन्दगी की आपा -धापी में
सब कुछ था अजमाया हमने बस समझ ये ही आया इस जिन्दगी की दौड़ा -भागी में
सारी अक्ल ,सारी होशयारी बस रह जाती है धरी की धरी इस जिंदगानी में
बड़े से बड़े बन्दों को देखा है मिलते खाक और मिटटी में इसी जिन्दगी में
जो लिखा कर आये है तकदीर अपनी वो ही पाते हैं सब सुख जिन्दगी में
अक्सर देखा है बहुत से कर्मयोगी कर्म करते है पूरा इस जिंदगी में
पर कुछ भी ना कर पाते हैं हासिल सारी की सारी जिंदगी में
इस को भाग्य का लिखा कहा जाये या कहें किस्मत की बुलंदी
बिना कुछ करे भी वो सब कुछ पा जाते हैं जिन्दगी में
मंगलवार, 3 जुलाई 2012
जीवन
हम सोच रहे थे कि हमने तो इसको बाँध रखा है मुटठी में
पर वो तो खिसक रहा था मुट्ठी में बंद रेत की मानिद
कब हो गया हाथ खाली हमको पता ही न चला
और समेट भी ना सके एक भी कण उस रेत का
जो समय जाता है गुजर लाख चाहो तो भी न पा सकोगे ऊम्र भर
क्योँ नहीं समझ पाया मानुस वक़्त रहते यह गणित
बस फिर बटोरता रहता है रेत के टुकडो को जीवन भर
शनिवार, 30 जून 2012
सावन की फुहार
प्यासी धरती ,सूखे अधर ,व्याकुल तन -मन
कातर नैन किसान के है तकते आसमान
मरणासन्न पपीहा नभ को तके आये न उसको चैन
अतृप्त चक्षु मांगे इश्वर से बरसा दो जल दिन- रैन
पपड़ाए अधर और बोझिल काया कहीं न पाए चैन
धरा ,नर -नारी ,पशु -पक्षी सभी हैं आसन्न और बैचैन
अब बरसा भी दो नेह अमृत सा और सबकी रूह पाएं चैन
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