शनिवार, 8 मार्च 2014

अपने -पराये





यह जिंदगी के चक्र का अजीब फलसफा है
कभी यह शीर्ष पर तो कभी गर्त में गिराता है
शीर्ष पर सुख और गर्त में घनघोर सताता है
काश ,हो जाये कुछ ऐसा कि चले मनमाफिक वक्त का पहिया
अपनों और गैरों की पहचान यह वक्त का पहिया ही कराता है
यूं तो सब अपना दिखाने का करते हैं हर वक्त ढकोसला
पर रंगें सियारों की पहचान तो यह ही कराता है


गुरुवार, 6 मार्च 2014

नवयुगल


यात्रा में मिला एक नवयुगल ,प्रेमरस से जो था सरोबार
पूरे रास्ते जो खींच रहा था सबका ध्यान अपनी ओर बार -बार
अभी- अभी जो लौट रहे थे शायद हनीमून से अपने घर- बार
ट्रेन में सारे रास्ते करते जा रहे थे असभ्यता बार -बार
यूं सारे राह ना उनका स्नेह प्रदर्शन भा रहा था किसी भी सहयात्री को 
जैसे ही निकट आया उनका स्टेशन पत्नी के रंग बदले बार -बार
पति पर चीखी की उतारो सूटकेस और निकालो सामान तत्काल
नौकर की भांति लपका वो और रखा सूटकेस उसके चरणों में तत्काल
निकला चूड़ी का डिब्बा और पहना चूडा ,सजा ली कलाई उसने
दी सिन्दूर की डिब्बी पति के हाथ ,हुकुम साथ भरने को गहरी मांग
लगाने को कहा बिंदिया माथे पर ,ना था कोई शीशा उसके पास
पर्स से निकाले बिछिया , और नेलपालिश सजाने को हाथ -पाँव
झट तैयार हो गयी वो नव व्याहता .देखे सबने उसके रंग हजार
क्या वो बिच्या ,मांग सब पति प्रेम का प्रदर्शन था?
या सास का डर उसको कर रहा था मजबूर इस नाटक को करने को
Like ·  ·  · 2 seconds ago · 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014




हे त्रिपुरारी जब ,जब प्रथ्वी पर असुरों का आतंक छाया है ,दानवों ने कोलाहल मचाया है आपने सदेव तीसरा नेत्र खोलकर इन राक्षसों को भस्म किया है ,प्राणिमात्र की सदेव रक्षा की है ....जागो और अपने भ्रमास्त्र का सदुपयोग करो यह धरती पापों के दावानल तले गर्त में जा रही है आतंकी ,बलात्कारी .झूटे ,मक्कार जैसे सैंकडों दानवों ने अपना सर्वस्व साम्राज्य फेला लिया है ....जागो शिवा जागो

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

लाचारी और बेबसी



देखा कल राह में एक अद्भुत नज़ारा
एक बूढा ,क्रश्काए शरीरसे लाचार था बेचारा
ठेले पर था सजाये कुछ छोटी -मोटी चीज़ों की दुकान
जो थीं उस गरीब की रोज़ी -रोटी का सामान
ठेले को हाथ जोड़कर चूम रहा था बार -बार
बुदबुदा रहा था कोई मंत्र मन में बार -बार
क्योंकि रोज सांझ को घर का चूल्हा जल पाता है सिर्फ
उसकी दिन भर की कमाई से ,चलता है घर- परिवार
जैसे करते हैं पूजा -इबादत बड़े-बड़े सेठ साहूकार अपने प्रथिष्ठानों की
वो गरीब भी कर रहा था उतनी ही इबादत अपने थोड़े से सामान की
आँखों में ढेरों सपने सजा कर बड चला वो अपनी मंजिल की ओर
पत्नी और बच्चे भी देख रहे सूनी आँखों से उसको जाते दूर 

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

हाय री किस्मत



बचपन से ही पाथते रहे ईटें ,वो बच्चे भट्टों पर
देखते गुजरती रही उम्र ईंटों को उनकी भट्टों पर
सबके आश्याने वास्ते हाथों से बन गयीं लाखों ईटें
पर वो गरीब बना ना सका एक खोली भी उम्र भर
उफ़ ,,,,,कुदरत के खेल भी हैं कैसे अनोखे
जो दर्जी सीता रहा सबके वस्त्र उम्र भर
अपने लिए ना जोड़ पाया साबुत एक कमीज़ उम्र भर 

खुदा की नेमत


कभी रोना रोते रहे कि किस्मत नहीं साथ दे रही
कभी रोये सुनकर कि सेहत नहीं साथ दे रही
कभी रही तकलीफ कि हालत नहीं साथ दे रहे
कभी था रोना कि परिवार साथ नहीं दे रहा
पूरी उम्र निकाल दी रोते -रोते ,ईश्वर को कोसते -कोसते
कभी दायें -बाएं मुड़कर ना देखा ,जो था पाया उसको ना सराहा
उस ईश्वर ने जो दिया ,उसको हमेशा था ठुकराया
अब मौत का आ गया बुलावा दरवाज़े पर
तो था वो अब हमको खुदा याद आया 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

नवप्रसूता का अप्रितम सौंदर्य




अपने लाल को स्तनपान कराती नवप्रसूता का अप्रितम सौंदर्य
उसकी आँखों से टपकता अद्भुत लाड़-दुलार
कपोलों पे छलकती मातृत्व की लालिमा
माँ की आत्मा भी जैसे एकाकार होने को लालायित
अपने बालक में ,उसके सम्पूर्ण अस्तित्व में
उसके एक रुदन पर माँ का चहक उठना जैसे हुआ हो आघात खुद उस पर
कानों में बजें माँ के सुमधुर घंटियाँ ,ज्यों मुस्का भी दे लाल
क्या ऐसा अद्भुत सौंदर्य धरा पर किसी से तुलना करने योग्य है
इस सौदर्य के आगे सभी विशेषण रह जाते बौने ,कोरे अस्तित्वहीन 

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...