कल नवमी पर गए थे मंदिर माता के दर्शन करने ,वहां देखा जगह -जगह भंडारे हो रहे थे और बड़ी चहल -पहल थी बड़ा शोर था पास जाकर देखा तो कन्याओं के वास्ते लड़ाई हो रही थी क्यूंकि कुछ ही बच्चियां वहां पर नज़र आ रही थी और उनको लेकर खींचातानी हो रही थी ,उन कन्याओं को पूजा और भोजन वास्ते हर कोई अपने साथ ले जाना चाह रहा था बच्चियां कह रही थी भूख नहीं है ,हम थक गए हैं पर आज तो उनके पैर छू -छू कर मनाया जा रहा था ......वाह रे विधाता क्या किस्मत लिखी है स्त्री जात की बस एह दिन मान -मनुहार अगले दिन ही तिरस्कार आज भरपेट भोजन कल से ही अत्याचार ,यूं ही सिलसिला चलता रहा भ्रूण -हत्या का ,बहुओं को यूं ही जलाते मारते रहे ,लड्कियौं की अस्मत यूं ही पाँव तले रौंदते रहे तो वो दिन दूर नहीं कि हिन्दुस्तान के स्थान पर विदेश जाना होगा बहु लेने ..... कई राज्यों में तो विवाह हेतु कन्याओं कीबहुत कमी हो गयी है ...........
बुधवार, 9 अप्रैल 2014
शनिवार, 8 मार्च 2014
अपने -पराये
यह जिंदगी के चक्र का अजीब फलसफा है
कभी यह शीर्ष पर तो कभी गर्त में गिराता है
शीर्ष पर सुख और गर्त में घनघोर सताता है
काश ,हो जाये कुछ ऐसा कि चले मनमाफिक वक्त का पहिया
अपनों और गैरों की पहचान यह वक्त का पहिया ही कराता है
यूं तो सब अपना दिखाने का करते हैं हर वक्त ढकोसला
पर रंगें सियारों की पहचान तो यह ही कराता है
कभी यह शीर्ष पर तो कभी गर्त में गिराता है
शीर्ष पर सुख और गर्त में घनघोर सताता है
काश ,हो जाये कुछ ऐसा कि चले मनमाफिक वक्त का पहिया
अपनों और गैरों की पहचान यह वक्त का पहिया ही कराता है
यूं तो सब अपना दिखाने का करते हैं हर वक्त ढकोसला
पर रंगें सियारों की पहचान तो यह ही कराता है
गुरुवार, 6 मार्च 2014
नवयुगल
पूरे रास्ते जो खींच रहा था सबका ध्यान अपनी ओर बार -बार
अभी- अभी जो लौट रहे थे शायद हनीमून से अपने घर- बार
ट्रेन में सारे रास्ते करते जा रहे थे असभ्यता बार -बार
यूं सारे राह ना उनका स्नेह प्रदर्शन भा रहा था किसी भी सहयात्री को
जैसे ही निकट आया उनका स्टेशन पत्नी के रंग बदले बार -बार
पति पर चीखी की उतारो सूटकेस और निकालो सामान तत्काल
नौकर की भांति लपका वो और रखा सूटकेस उसके चरणों में तत्काल
निकला चूड़ी का डिब्बा और पहना चूडा ,सजा ली कलाई उसने
दी सिन्दूर की डिब्बी पति के हाथ ,हुकुम साथ भरने को गहरी मांग
लगाने को कहा बिंदिया माथे पर ,ना था कोई शीशा उसके पास
पर्स से निकाले बिछिया , और नेलपालिश सजाने को हाथ -पाँव
झट तैयार हो गयी वो नव व्याहता .देखे सबने उसके रंग हजार
क्या वो बिच्या ,मांग सब पति प्रेम का प्रदर्शन था?
या सास का डर उसको कर रहा था मजबूर इस नाटक को करने को
अभी- अभी जो लौट रहे थे शायद हनीमून से अपने घर- बार
ट्रेन में सारे रास्ते करते जा रहे थे असभ्यता बार -बार
यूं सारे राह ना उनका स्नेह प्रदर्शन भा रहा था किसी भी सहयात्री को
जैसे ही निकट आया उनका स्टेशन पत्नी के रंग बदले बार -बार
पति पर चीखी की उतारो सूटकेस और निकालो सामान तत्काल
नौकर की भांति लपका वो और रखा सूटकेस उसके चरणों में तत्काल
निकला चूड़ी का डिब्बा और पहना चूडा ,सजा ली कलाई उसने
दी सिन्दूर की डिब्बी पति के हाथ ,हुकुम साथ भरने को गहरी मांग
लगाने को कहा बिंदिया माथे पर ,ना था कोई शीशा उसके पास
पर्स से निकाले बिछिया , और नेलपालिश सजाने को हाथ -पाँव
झट तैयार हो गयी वो नव व्याहता .देखे सबने उसके रंग हजार
क्या वो बिच्या ,मांग सब पति प्रेम का प्रदर्शन था?
या सास का डर उसको कर रहा था मजबूर इस नाटक को करने को
गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014
हे त्रिपुरारी जब ,जब प्रथ्वी पर असुरों का आतंक छाया है ,दानवों ने कोलाहल मचाया है आपने सदेव तीसरा नेत्र खोलकर इन राक्षसों को भस्म किया है ,प्राणिमात्र की सदेव रक्षा की है ....जागो और अपने भ्रमास्त्र का सदुपयोग करो यह धरती पापों के दावानल तले गर्त में जा रही है आतंकी ,बलात्कारी .झूटे ,मक्कार जैसे सैंकडों दानवों ने अपना सर्वस्व साम्राज्य फेला लिया है ....जागो शिवा जागो
सोमवार, 24 फ़रवरी 2014
लाचारी और बेबसी
देखा कल राह में एक अद्भुत नज़ारा
एक बूढा ,क्रश्काए शरीरसे लाचार था बेचारा
ठेले पर था सजाये कुछ छोटी -मोटी चीज़ों की दुकान
जो थीं उस गरीब की रोज़ी -रोटी का सामान
ठेले को हाथ जोड़कर चूम रहा था बार -बार
बुदबुदा रहा था कोई मंत्र मन में बार -बार
क्योंकि रोज सांझ को घर का चूल्हा जल पाता है सिर्फ
उसकी दिन भर की कमाई से ,चलता है घर- परिवार
जैसे करते हैं पूजा -इबादत बड़े-बड़े सेठ साहूकार अपने प्रथिष्ठानों की
वो गरीब भी कर रहा था उतनी ही इबादत अपने थोड़े से सामान की
आँखों में ढेरों सपने सजा कर बड चला वो अपनी मंजिल की ओर
पत्नी और बच्चे भी देख रहे सूनी आँखों से उसको जाते दूर
एक बूढा ,क्रश्काए शरीरसे लाचार था बेचारा
ठेले पर था सजाये कुछ छोटी -मोटी चीज़ों की दुकान
जो थीं उस गरीब की रोज़ी -रोटी का सामान
ठेले को हाथ जोड़कर चूम रहा था बार -बार
बुदबुदा रहा था कोई मंत्र मन में बार -बार
क्योंकि रोज सांझ को घर का चूल्हा जल पाता है सिर्फ
उसकी दिन भर की कमाई से ,चलता है घर- परिवार
जैसे करते हैं पूजा -इबादत बड़े-बड़े सेठ साहूकार अपने प्रथिष्ठानों की
वो गरीब भी कर रहा था उतनी ही इबादत अपने थोड़े से सामान की
आँखों में ढेरों सपने सजा कर बड चला वो अपनी मंजिल की ओर
पत्नी और बच्चे भी देख रहे सूनी आँखों से उसको जाते दूर
गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014
हाय री किस्मत
बचपन से ही पाथते रहे ईटें ,वो बच्चे भट्टों पर
देखते गुजरती रही उम्र ईंटों को उनकी भट्टों पर
सबके आश्याने वास्ते हाथों से बन गयीं लाखों ईटें
पर वो गरीब बना ना सका एक खोली भी उम्र भर
उफ़ ,,,,,कुदरत के खेल भी हैं कैसे अनोखे
जो दर्जी सीता रहा सबके वस्त्र उम्र भर
अपने लिए ना जोड़ पाया साबुत एक कमीज़ उम्र भर
देखते गुजरती रही उम्र ईंटों को उनकी भट्टों पर
सबके आश्याने वास्ते हाथों से बन गयीं लाखों ईटें
पर वो गरीब बना ना सका एक खोली भी उम्र भर
उफ़ ,,,,,कुदरत के खेल भी हैं कैसे अनोखे
जो दर्जी सीता रहा सबके वस्त्र उम्र भर
अपने लिए ना जोड़ पाया साबुत एक कमीज़ उम्र भर
खुदा की नेमत
कभी रोये सुनकर कि सेहत नहीं साथ दे रही
कभी रही तकलीफ कि हालत नहीं साथ दे रहे
कभी था रोना कि परिवार साथ नहीं दे रहा
पूरी उम्र निकाल दी रोते -रोते ,ईश्वर को कोसते -कोसते
कभी दायें -बाएं मुड़कर ना देखा ,जो था पाया उसको ना सराहा
उस ईश्वर ने जो दिया ,उसको हमेशा था ठुकराया
अब मौत का आ गया बुलावा दरवाज़े पर
तो था वो अब हमको खुदा याद आया
कभी रही तकलीफ कि हालत नहीं साथ दे रहे
कभी था रोना कि परिवार साथ नहीं दे रहा
पूरी उम्र निकाल दी रोते -रोते ,ईश्वर को कोसते -कोसते
कभी दायें -बाएं मुड़कर ना देखा ,जो था पाया उसको ना सराहा
उस ईश्वर ने जो दिया ,उसको हमेशा था ठुकराया
अब मौत का आ गया बुलावा दरवाज़े पर
तो था वो अब हमको खुदा याद आया
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