सोमवार, 11 जुलाई 2011

हाय-हाय गर्मी

उफ़ यह गर्मी का मौसम खूब रुलाता है

मौसम के साथ- साथ बिजली कटौती का दुःख सताता है
बिजली कटौती के साथ जनरेटर की आवाज से दम निकलता है
जनरेटर के साथ रात में मचछरो का संगीत सबको जगाता है
रात में संगीत और दिन में बदहजमी का दर्द सताता है
बदहजमी के साथ डायरिया, वायरल किलीनिक के चक्कर कटबाता है
किलीनिक के चक्करों के साथ-साथ फोड़े- फुंसी और घमौरिओं का आतंक रुलाता है

हर तकलीफ परेशानी झेल कर भी ये मौसम
हर साल अपना का इंतजार करता है
हर साल यह मौसम आम,खुमानी,लीची
भी भरपूर संग अपने लाता है
वर्फ का गोला,चुस्की,कुल्फी, फालूदा भी
यही मौसम खिलबाता है .. ...

रविवार, 3 जुलाई 2011

पितृ दिवस

पितृ दिवस पर किया लिखूं पिता के बारे में
हम दो बहिनों का बचपन से जीवन सवांरा उन्होंने 
नहीं याद ऐसी कोई चाहत जो रही हो अधूरी 
हर कोशिश, यथाशक्ति से जो न की हो उन्होंने पूरी 
भाई न था तो बेटीयों को पाला बेटों से बढकर 
कभी न किया भेदभाव हमको लड़की समझकर 
हर यकीं के साथ भेजा बाहर हमको बढ-चढकर
ना रहने दी कोई कमी -कभी ,शादी व्याह और घर पर 
खाली पितृ दिवस पर याद करने-
बधाई देने पर होता न मकसद पूरा 
मकसद होगा उनके बताये उसूल, रास्तो पर चलकर 
उनके अनुभव और तजुर्वों से  कुछ सीखकर 
गर कर सके हम उन सपनो को पूरा 
तो यही होगा सच्चा प्यार और होगा सबका जीवन सुनहरा ....

मंगलवार, 21 जून 2011

कोमल अहसास

15th June 
आज है बेटे का जन्म दिन 
प्रफुल्लित है, आह्वावादित है तनमन 
जन्म दिन के साथ ही याद आता है मासूम क्रदन

प्रथम स्पर्श,उस मासूम का कोमल स्पंदन 
छू छूकर देखा था बार- बार उस नन्ही सी जान को 
और पाया था अदभुत, आत्मिक, संतोष तनमन को 

वो नवजात शिशु का टकटकी लगा कर देखना 
भिगो गया था सर्वस्व आत्मा को, प्रत्येक छण 
किसी भी चीज की अदभुत चाह और उसको पाना 

न कर सकती हूँ वयां क्यूंकि यह जिसने चाह उसी ने है जाना 
की कैसे हो सकता वयां ....


मंगलवार, 7 जून 2011

हर युग की कहानी नारी की जुबानी

बरसो से हम बात करते रहे हैं समानता की 
पर नारी को ही छलते आये  हैं इसकी दुहाई दे-देकर

हर युग में ही भोग्या बनती आई है नारी 
कभी सखा, कभी प्रयेसी और कभी पत्नी बनकर

रघुकुल में भी भोगा है दारुण दुःख सीता और उर्मिला ने 
एक ने काटा बनबास अरण्य में, दूसरी ने राज कुल में

यदुवंश में भी राधा ने ही काटा अपना जीवन प्रभु प्रेम में 
सनेत्र बांधी पट्टी गांधारी ने और पाया अंधत्व का दारुण दुःख

बांटी गई पांचाली पांच पतियों में जो व्याही गयी सिर्फ अर्जुन को 
कांप उठती है आत्मा जब भी सोंचती हूँ इन सबके दुःख को 

पुरुष ने तो हमेशा ही भोगा त्यागा और कष्ट दिया इन सबको 
अग्नि परीक्षा तो दी है सदैव नारी और अबला ने

कष्ट, दुःख,  विरह-वेदना सबको झेला है हर युग में उसने 
ना ही कोई युग बदला , ना ही बदली हमारी सोंच

हम कितना आधुनिक युग में चाहे जी ले पर 
त्याग बलिदान आज भी है हिस्से में तो नारी के कांधो पर..  

मेरी दुनिया

ग़मों से तो बहुत पुराना नाता रहा है हमारा 
होश संभाला तो लड़का न होने का मलाल करते पाया 
कुछ बड़े हुए तो रंग सांवला होने का ज़माने ने लगाया ताना 
जैसे-तैसे व्याह हुआ तो ना मिला वहां भी कोई हमारा
ना देखता गुणों को कोई वस अपबाद बताते सारा  

फिर  जन्मी बेटियां , वो भी दिया दोष हमारा  
बेटियां लातीं इनाम और पिता की सारी तकलीफों
सारा हिस्सा था हमारा 
पर कहते है न की घूरे के भी दिन बहुरते हैं ?  
हमारा भी समय चक्र पलटा और पाया बच्चो अपने बच्चो का सहारा 
बेटियों ने किया नाम रोशन और जगमग हुआ आज संसार हमारा ..

मेरे अपने

कुछ लोग ऐसे मिल जाते हैं जिन्दगी में 
कि जुड़ जाते है वो जीवन चक्र कि धारा में 
पास रहकर कर जाते हैं वो आत्मा त्रप्त 
और दूर रहकर भी उनकी दुआएं करती हैं संतप्त 
दिल से दी गई दुआ का भी असर दिखता फ़ौरन 
हर मुश्किल घडी कटती है ऐसे जैसे शेर को देखकर भागे हिरन 
दिल हमारा भी देता है दुआ उनको कि रहे हमेशा उनकी हम पर नज़र 
पाएं वो भी सारे जहाँ की खुशियाँ और कुदरत का न हो उन पर कहर ..

शनिवार, 4 जून 2011

परउपदेश, कुशल बहुतेरे

बहुत है आसां है दूसरों को सीख देना 
पर कर गुजरना है बहुत मुश्किल 
कहना तो बहुत आसां है दरिया में कूद जाओ 
पर साथ ही खुद करके दिखाना है बा मुश्किल 
दूसरो को सीख भी तभी दो जब हिम्मत दिखाओ खुद कूदने की 
कुछ कर गुजरेंगे, जब ऐसा जमाना भी करेगा कद्र जज्बे की...

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...