गुरुवार, 22 सितंबर 2022

 औकात से ज्यादा खर्च करने की प्रवर्ती नौजवानो को धकेल रही है गर्त में

कपड़ा ,जूता,बाइक, मोबाइल सबसे ऊपर है इस खर्चे की लिस्ट में ,
बिन अपने घरेलू हालात,साहूकार के कर्जे के बाबजूद हो रहे रोज़ बर्बाद
मुख में गुटका ,कान में ईयरफोन समेट रहा युवकों को बर्बादी के आगोश में
शिक्षा से भटकता ध्यान ,मेहनत से कोसों दूर भाग रहा आज का इंसान
मोबाइल चार्जिंग पर है उसका सारा ध्यान ,यह ही ज़िंदगी जी रहा हर नौजवान रातों को लेता मोबाइल से अनर्गल ज्ञान ,भविष्य से है वो कतई अंजान
सिर्फ अपने लिए है जी रहा युवा ,परिवार ,समाज का है ना उसको कोई भान
टूटते परिवार ,दरकते रिश्ते बन रहे इसका सबब ,रिश्तों का उसको मिला ना ज्ञान
कुछ वर्षों में हम कहाँ आ पहुंचे? ,आगे क्या होगी मंज़िल ?हम सब हैं इससे अंजान
बर्बादी की ओर बड़ती हमारी नस्लों पर भी लगाना होगा हम सबको पूरा ध्यान
शिक्षा ,मेहनत ,परिवार ,समाज कुछ बातों का देना होगा नित ज्ञान ....
--रोशी
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बुधवार, 21 सितंबर 2022

 जब तक जिए माँ-बाप ,एक पिछवाड़े की कोठरी में दुनिया से दूर ही रखा

दो वक़्त की सूखी रोटी ,कुछ भाजी के टुकड़े ,बरसों से था उन्होने यह ही चखा
पुरानी कथरी में बस रहते सिमटे ,दुनिया से पूरे कटे शायद यह ही था जीवन
बेटे की शक्ल देखने को थे रोज तरसते ,बच्चों के बिन बेरंग था उनका जीवन
ऊंचे ओहदे पर आसीन बेटे ,उच्च व्यवसायी पुत्र सब रहते निज दुनिया में मगन
जनमदाताओं से मिलना उनको है दूभर ,जिन्होंने दिया यह शोहरत भरा जीवन
रोटी-छत देकर कर ली अपने कर्तव्यों की इतिश्री ,बना दिया नरक उनका जीवन
श्राद्ध में भव्य पंडाल ,विविध व्यंजन परोस कर समाज को दिखा रहे निज वैभव
भूखा रखकर ,कर्तव्यों की इतिश्री कर श्राद्ध तो कर चुके उनका रहते जीवन
अब वस्त्र ,भोजन देकर क्या मिलेगा ,जब संवार ना सके वृद्ध माँ -बाप का जीवन
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-- रोशी

सोमवार, 12 सितंबर 2022

 नारी ही होती है घर क़ी धुरी, घूमती है जिसके चहुं ओर कायनात सबकी

उसके जगते चूल्हा सुलगे ,बर्तन भी बतियाना शुरू हो जाते शक्ल देख उसकी
अदरक की चाय से सुवासित रसोई है महके ,नाश्ते की खुशबू से मन है चहके
आँगन ,चौबारा गृहडी से ही चमके ,कमरा ,बैठक उसके दम पर ही दमके
मिष्ठान ,स्वादिष्ट व्यंजन मिलते हैं अतिथि ,परिवार और बच्चों को
पूजा घर से धूप बत्ती की महक और बजती घंटी भर देती ऊर्जा जीवन को
चमकते वस्त्र ,सुसज्जित घर भर देता उत्साह जीवन में ,देता उमंग जीने को
बिन नारी घर भूतों का डेरा ,अव्यवस्था ,गंदगी ,का सिर्फ होता बसेरा घर में
जिस पर बीते वो ही जाने ,हो जाता है ढेरों दुश्वारीओं का आगमन जीवन में
-- रोशी
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बुधवार, 7 सितंबर 2022

 ज़िंदगी और पहाड़ी सड़क में बहुत समानता होती है

कब ऊंचाई ,कब ढलान पता ही नहीं चलने देती है
कब हम आसमान से नीचे टपकते हैं पता ना है चलता
कैसे हम समतल डगर पर आ गिरते अंदेशा ना होता
ज़िंदगी में कब अचानक कुहासा आ जाए ज्ञात ना होता
जैसे पहाड़ पर चलते अचानक बदरी छा जाए ज्ञात ना होता
सबक देती हमको यह डगर ज़िंदगी का भरपूर जो हमको पता ना होता
कामयाबी और नाकामी रहो दोनों के लिए तैयार ,जैसे पहाड़ी यात्रा में होता
कब कोहरे की शक्ल में मुश्किल छा जाए जिसका एहसास भी ना किया होता
खुद को सम्हाल ,एक एक कदम जैसे बड़ाते पर्वतीय यात्रा में हम खुद को
वही फलसफा है ज़िंदगी का ,सावधानी हटी,दुर्घटना घटी ,सम्हालना है खुद को
-- रोशी
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मंगलवार, 16 अगस्त 2022

 बड़ती उम्र ,सर के सफ़ेद बाल दे जाते ढेरों अनुभव ज़िंदगी की बेहतरीन डगर पर

स्वतः आ जाती है अक्ल ,हंसी भी आती अक्सर अपने खुद के विगत फैसलों पर
बचपन में सुना करते थे बुजुर्गों को कहते ,बाल धूप में कदापि सफ़ेद नहीं होते
वक़्त खुद -बा-खुद खोल देता है बंद अक्ल के ताले ,जो जवानी में नहीं हैं खुलते
बचपन से लेकर बुडापे तक रोज़ मिलता है तजुर्बा नवीन जो किताबों में ना मिलते
गलतियाँ खुद सिखाती हैं नए अनुभव ,दूसरों से भी ढेरों तजुर्बे हैं नित -प्रति दिन मिलते
हम बांटते हैं इनको अपनी नयी पीड़ी को ,जो उनको किसी किताब में नहीं मिलते
रोशी --
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