गुरुवार, 1 सितंबर 2011

अर्धशतक किया है आज मैंने पूरा

जीवन का अर्धशतक किया है आज मैंने पूरा 
लगता नहीं है की पचास का आंकड़ा छू लिया है पूरा
पीछे मुड़कर देखा तो पाया, कि अभी तो हम बच्चे थे 
क्यूंकि हर वक्त माँ पिता का वरद हस्त था हम पर पूरा
माँ तो हमेशा बना कर रखती थीं ,अपना बच्चा हमको पूरा
फिर जिन्दगी उलझ गई छोटे- छोटे बच्चों को पालने पोसने में 
उनकी शिक्षा, उनकी जिन्दगी के अहम् फैसलों को किया पूरा
दो बेटिओं के बाद पाया राघव (बेटा) को जिसने जीवन को हमारे संवारा  
फिर खोया माँ को, लगा जिंदगी को खुशिओं का साथ न था गवारा 
जिन्दगी फिर दौड़ाने लगी पटरी पर क्यूंकि जाने बाले के साथ न जाया जाता 
समय चक्र का पहिया दौड़ रहा था और हमको तनिक न पता चला 
जब पता चला तो पाया कि हम आधी से ज्यादा यात्रा कर आये 
अब थोडा जीवन बाकी है आशा है सुख से कट जाये 
हम वो छडं न भूल पाएंगी जब प्रभु ने दिया एक अनुपम उपहार 
आन्या (नातिन) से पाया मैंने नव निर्मल रिश्तो का संसार 
पचासवी तो मना रही हूँ सबके साथ 75 वी0 भी शायद मना ले आप लोगो के साथ
ये सब कुछ है अब परम पूज्य ठाकुर जी के हाथ ....

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

रात का सन्नाटा

रात का सन्नाटा था पसरा हुआ
चाँद भी था अपने पुरे शबाब पर 
समुद्र की लहरें करती थी अठखेलियाँ 
पर मन पर न था उसका कुछ बस 
यादें अच्छी बुरी न लेने दे रही थी चैन उसको 
दिल को सुकून देने का था तमाम बंदोबस्त वहां 
पर दिमाग को था न जरा भी चैन वहां 
उसके अनगिनत घाव थे और आत्मा थी लहुलोहान 
सबको मौसम रहा था लुभा और था बहुत हसीन
पर जो बबंडर दिल में उठ रहा है उसका क्या ? 
मन को ना आये खुबसूरत चाँद और उठती समुद्र की लहरें 
क्यूंकि विदार्ण आत्मा ने तो बना दिया हर जख्म सूल 
बहती बयार सुंदर समां कुछ भी न खुश कर सका उसको 
बस ये सब था उसके मन के लिए एक धूल.. 

























मंगलवार, 26 जुलाई 2011

इंतजार

यह इंतजार भी कितनी खुबसूरत चीज है 
जन्म से मृत्यु तक हर इंसा के दिल को अजीज है 
बहु के पाँव भरी होने से शुरू होता है इंतजार 
पोता या पोती, दादा- दादी, नाना-नानी को रहता है इंतजार 
नवागत का आगमन कर देता है घर को गुलजार 
कब चलेगा, कब बोलेगा, कब बैठेगा अब है यह इंतजार 
कौन सा स्कूल, कौन सा कालेज क्या करियर होगा तब-तक 
युबाओं में अब जागी है अपने प्रियतम से मिलन का इंतजार 
माँ को भी होता बहु और दामाद का घर आगमन का इंतजार 
रिश्ता तय हुआ, शुरू होता अब विबाह ही बेला का इंतजार 
है न कितनी खूबसूरत यह इंतजार नाम की बला 
कट जाती है पूरी जिन्दगी इंतजार ही इंतजार में .
ख़तम न होता यह जीवन में एक बार .....


आया सावन झूम के

सावन की गिरती बूंदे
भिगो जाती हैं सर्वस्व तन- मन
तृप्त कर जाती हैं धरती की प्यास
और पपीहे की धड़कन
बड़ा जाती हैं सजनी की आस
पिया मिलन को धड़कता मन
प्यासे खेत में टपकती बूंदों को देख
लरजता है किसान का मन
सावन के अंधे को हरा ही दिखता है ,
चरितार्थ करता है यह सावन
गाव में झूले, भरते ताल तलैया
हुलस-हुलस उठता है मन
नीम और अमुआ पे पड़े झूले
उमंग से भर देते बालको का मन
पशु -पक्षी , नर नारी सम्पूर्ण धरा भी नाच उठती
है पाकर सावन का संग .......


रविवार, 24 जुलाई 2011

नातिन का स्कूल का पहला दिन

नातिन का स्कूल का पहला दिन 
अगली पीड़ी के पहले बच्चे का, पहला दिन  
याद आ गया फ़ौरन जब उसकी माँ गई थी स्कूल 
ख़ुशी थी रोमांच था और बच्ची भी थी बहुत कूल
पूरे बक्त ह्रदय  में रही हूक दिल में थे डेरों शूल 
काश उस नन्ही जान को समेट लेतीं आंचल में 
ना भेजती स्कूल 
पर कहाँ था यह संभव बच्ची को तो जाना ही था स्कूल 
आज गई है उसकी भी बेटी- वो भी है वैसी ही कूल 
कहानी फिर बहीं से शुरू  होती है पर बदल गया है स्कूल 
सुंदर बाताबरण ए.सी रूम नये- नाज नखरे पर है तो 
वो भी स्कूल 
बेटी बोली माँ बच्ची रोती है देखते ही अपना स्कूल 
बड़ा दिल घबराता है जब मेड ले जाती है स्कूल 
मई बोली मेरा भी दिल घबराया था जब भेजा था तुमको स्कूल 
कितनी हो गई थी मई भी बेचैन घर में 
मस्तिस्क था शून्य जब तुम भी गई थीं स्कूल 
समय चक्र तेजी से घूमता है चाहें हो बह कूल या प्रति-कूल 
इतिहास स्वयं ही दोहराता है हो चाहें हमारे अनुकूल या प्रति-कूल.






बिकता है इन्सान

आज के युग में सब कुछ बिकता है इंसा खरीदता है 
अस्मत बिकती है आबरू बिकती है और बिकता है इन्सान 
कही लड़की बिकती , कहीं बच्चा बिकता खरीदता है सारा जहान

रिश्ते बिकते, परम्पराये बिकती, बिकता है मान और सम्मान 
पति- पत्नी , भाई-बहन , चाचा- ताऊ, साली- जीजा 
सारे रिश्ते है बिकते, जैसे बिकता है अख़बार 

माँ -बच्चा, बेटी- पिता, सरीखे रिश्ते भी हैं बिकते 
कितनी गर्त में जा रहे हैं हम, इसको क्यूँ न समझ सकते 
जिन्दगी की आपाधापी में प्यार संस्कार सब हैं बेकार 

नेता, अफसर, समाजसेवी और नर- नारी 
गर न चेते तो क्या दे पाएंगे एक सुंदर संसार ?
देखो जरा निगाहों से कैसे बिकता है इन्सान ?

दरकते रिश्ते गिरता सामाजिक ढांचा, क्या अभी न इसको रोक सकते 
क्या सही रास्ता अपनाना इतना कठिन है आज क्यूँ बिकता है इन्सान ?

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

बेटी की समझदारी

बेटियां होती हैं कितनी मासूम, कोमल और समझदार
पैदा होती हैं तो शायद सबको रुलाती हैं हर बार
पर उम्र बढने के साथ ही हो जाती हैं होशियार

घर-परिवार , माँ बाप की इज्जत की होती है दरकार
कोई भी लक्षमण रेखा पार करने से पहले सोचती है दस- बार
खुद काँटों से लहू लोहान होती हैं पर माँ बाप को बचाती हैं हर बार
बचपन से ही भाईयों की ढाल बनती रही हैं हर बार
यही त्याग, सयम और प्यार बचपन से सीखती बुनती आई है
आपने जीवन के हर रूप में नवीन श्रंगार ...........

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...