गुरुवार, 22 सितंबर 2011
सोमवार, 12 सितंबर 2011
आतंकवाद
कितना आसान लगता है, हमारे नौजवानों को
उपर बैठे उनके आका, पथ-भ्रष्ट करते इंसानों को
कितनी मांगें होती हैं सूनी, कितनी कोखें हैं उजड़ती
ये रत्ती भर भी न होता है, महसूस उन आतंकियों को
रोते- कलपते अनाथ बच्चे, अपनों को खोने का गम परिवारों का
हिला भी न पाता है, आत्मा और जमीर हैवानो का
कभी भी न सोच पाते, ना ही सोच पाएंगे ये बेदर्द दरिन्दे
इन्सान कहना भी इंसानियत की बेइज्जती करना है, यह है खुदा के नेक बन्दे
इन खूनी आतंकिओं की ना है कोई ,जात ना है बिरादरी
ना है कोई अपना, ना है खानदान , ना ही है कोई रिश्तेदार
रोशी अग्रवाल
शनिवार, 10 सितंबर 2011
दुखवा मै का से कहूँ ?
नजर लग जाती है फ़ौरन ख़ुशी में हर पल
जब कभी पंख लगाकर उड़ना चाहा हमने
आसमा में ढेरो गिद्द-बाज मडराते नजर आये
फ़ौरन उड़ना भूल घोसले में बसेरा कर लिया
जब कभी चाहा आसमां में उड़ना और स्वच्छंद चह-चाहना
गंदे- भद्दे अनर्गल भाषण सुने कि जिव्हा भूल गयी बोलना
जब कभी चाहा स्वच्छंद विचरण करना यहाँ और वहां
इतनी बंदिशे, इतनी यंत्रनाये मिलीं कि चलना भूल गए
जब चाहा खुल कर हँसना, बोलना बतियाना, तानों में उलझ गए
बंद कर दी गई, जुबान कि शब्दों का अर्थ भूल गए....
आखिर लड़की जात को ही इतनी बंदिश क्यूँ है ?
क्यूँ आज भी समाज उनकी खुशियों पर अंकुश रखता है
रोशी अग्रवाल
मन की बेचैनी
हर बक्त कुछ दूंडता रहता है
अबूझे सवाल पूछता रहता है
हर पल आशंकाओ में घिरा रहता है
कुछ बुरा न हो इसी दर में जीता रहता है
क्यूंकि हो चुका है सब कुछ घटित बुरा उसके साथ
अब और कुछ न हो इसी में डूबा रहता है
क्या करे वो, कैसे संभाले इस दिल को
कुछ भी न होता जबाब है उसके पास
ये तो बस डरता रहता है, परेशा करता रहता है ..
हरियाली तीज
प्यासी धरती और झुलसता तन
शीतलता देता है बरसता सावन
हरियाली तीज आने को है सन्देश देता है यह सावन
दूर देश बैठी बेटी का आने को है बेक़रार मन
भैया को पीहर जाकर बांधुंगी राखी है यह बेचैन मन
जो न जा सकीं पीहर, ससुराल में हैं तड़पता उनका मन
माँ भी संजोती थी सपने और जोहती थी राह हर पल
आती होगी लाडो, झूलेगी झूला, रचेगी मेहंदी घर में होगा हल्ला गुल्ला
रोशी अग्रवाल
मंगलवार, 6 सितंबर 2011
जीवन चक्र
जीवन के पचास वर्ष पूरे कर लिए सोंच कर होती है हैरानी
समय चक्र कितनी तेजी से घूमता है बदल देता है जिन्दगी की रवानी
जिन्दगी पचास वर्षो में क्या बदला बयां करनी है अपनी जुवानी
कब बचपन गुजरा बन गए माँ फिर सास और बन गए अब नानी
हमारी जिन्दगी में पहले आयीं दो नन्ही परियां, उनको बाखूबी पढ़ाया लिखाया थीं वो घर की रानी
विगत दस- पंद्रह बर्षो में उलट- पलट गई जिन्दगी की सारी रवानी
माँ को खोया, बीमारी, डिप्रेशन और मुसीबतों ने भुला दी जिन्दगी की कहानी
पहले था माँ का साया, तो कभी भी न महसूस होने दी उन्होंने कभी कोई परेशानी
सबको सब सुख होते नहीं नसीब यही है हमारी जिन्दगी की एक छोटी सी कहानी
हमारा साथ दिया पापा ने बहन दोस्तों ने और बच्चो ने सुलझाई हर परेशानी
थाम कर जिनका हाथ कभी भी न रुकी हमारी जिंदगानी
आगे समंदर था गहरा पर हमारी कश्ती में भी थी पूरी रवानी
धीरे- धीरे, रफ्ता-रफ्ता किनारे की ओर बढ रही है हमारी जिंदगानी
रोशी अग्रवाल
मेरे दोस्त तेरे नाम
ईश्वर को यूँ ही दया बनी रहे तुम पर अपार
हम दोनों को शायद इश्वेर ने एक साथ ही दिया होगा आकर
कई समानताएं कई बातें आती रहीं हैं बार- बार
मै और तुम दोनों यहीं खेले और पले- बढें और सुख पाए
माँ- पिता की छत्र-छाया और जो सुख चाहा वो सभी थे पाए
किस्मत में था एक शहर में रहना साथ दोनों का वो भी निभाएं
हम दोनों ने ही ईश्वर प्रदत्त, एक- एक होनहार पुत्र रत्न पाए
माँ भी हम दोनों की जो घर से निकली, दुर्घटनावश लौट ना पायीं
आज हम दोनों पर ही ईश्वर ने छोड़ी जिम्मेदारिया- जो हम जा रहें हैं निभाए
मै पापा के पास और तुम्हारे पास पापा देखो है कितनी समानतायें
ईश्वर नवाजे तुम्हें ढेर सी खुशियाँ, और दूर करे सारी विपदाएं
कुदरत ने दी हैं हम दोनों की जिन्दगी में बहुत सी समानतायें
इन्सान कुछ भी न कर सकता है मांगते है हम यही दुआएं
जैसे अब तक निभाया है यह रिश्ता वैसे आगे भी हम-तुम निभाएं
जितनी भी जिन्दगी काटी अच्छी कटी और आगे भी सुंदरता से सजाएँ ...
रोशी अग्रवाल
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