शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

 रसोई से आती सुवासित पकवानों की खुशबू

दे जाती है आने वाले त्योहारों की दस्तक घर को
दीपावली का त्यौहार बिखेर देता है खुशियाँ हज़ार
घर लिपे -पुते हैं दिखते,अतिथि के स्वागत को हैं तैयार
बच्चे चेहकते ,घरों में फुदकते ,बिखराएं ख़ुशी अपार
रसोई ,सफाई ,पूजा की सामग्री , सजावट काम हैं अपार
व्यस्त है सब अपनी तरह मनाना है त्यौहार शानदार
कोई रूठे नहीं यह ही कोशिश करते हैं हर वर्ष बारम्बार
--रोशी



गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

 इतिहास गवाह है हम दिए जलाते हैं ,रोशनी करते हैं

राजा राम अयोध्या वापिस आये ,सीता जी के साथ
दीपावली का त्यौहार सदेव हम इसी ख़ुशी में मनाते हैं
कंही भी जिक्र नहीं है उर्मिला और लक्षमन की ख़ुशी का
उन दोनों का भी वनवास ख़त्म हुआ है आज १४ वर्ष का
उर्मिला ने अयोध्या में १४ वर्ष सिर्फ जागते हुए बिताये
वन में लक्ष्मण भी इतने वर्ष कहाँ एक पल भी थे सो पाए ?
तपस्विनी की भांति जीवन था गुजारा उर्मिला ने,तिल-तिल वो रोज़ जली थी
एकटक देखती थी वो उस राह को जो अचानक काँटों से भर गयी थी
इसी राह से गए उसको अकेले ,सुने महल में छोड़ पति भाई-भाभी के साथ वन को
पर इतिहास खामोश रहा सदेव उनकी व्यथा ,गहन पीड़ा ,तकलीफ बताने को
ना बाल्मीकि ने झाँका उनके जीवन में ,जहाँ था गहन अंधकार ,उनके जीवन पर
ना तुलसीदास ने मानस में उनकी व्यथा थी कभी दर्शायी, कुछ उनपर लिख कर
उर्मिला,लक्ष्मण सरीखा उधारण ना है दूजा, है जिसने प्रेम की विधा है सिखाई
भात्र प्रेम ,सातवचनों को था दोनों ने शिद्दत से निभाया पर दुनिया ना जान पाई..
--रोशी

सोमवार, 17 अक्टूबर 2022

 मात्र एक सप्ताह रह गया है दीपावली में

दिए ,झालरें ,खील -खिलौने दिखने लगे हैं बाज़ारों में
नए वस्त्र ,जूते-चप्पल ,खिलौने लगे हैं सब खरीदने में
हर इन्सान लगा है भागमभाग में ,अफरातफरी में
स्त्रियाँ व्यस्त हैं रसोई में ,बनाने में सुवासित पकवान
घर में फ़ैल रही है बेहतरीन खुशबू ,बच्चे व्यस्त हैं खाने में
घर ,ड्योडी लगे हैं सबकी सफाई में ,धूल-मिटटी ,व्यस्त हैं हटाने में
देवी लक्ष्मी लौट ना जाये घर से व्यस्त हैं सब अपने निवास को चमकाने में
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--रोशी

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

 रूबरू हुए एक नवविवाहिता से ,मांग में सिंदूर ,हाथों मे मेहंदी ,पाँव में था आलता

उस लड़की का चल रहा है तलाक का मुकदमा अदालत में हमको था यह पता
अक्सर जाती थी बकील के पास , थाना जाती थी करने अगली तारीख का पता
पति ने बेघर किया उसको ,इश्क़ फरमाया अन्य विवाहिता से उसको था यह पता
विधवा माँ के साथ एक वर्ष से थी रह रही जहां खाने ,कपड़े का था ना पता
मुश्किल है जिसका घनघोर जीवन ,हमको था यह बहुत अच्छे से पता
उस लड़की ने कल पूरा दिन करवाचौथ का रखा था निर्जला व्रत पूरी श्रद्धा के साथ
शाम को बिधि -विधान से खोला व्रत ,पूरे अपने साजो शृंगार के साथ
ससुराल अय्याश पति के पास नहीं जाना निश्चय कर डाला था केस पति के साथ
एक सवाल जेहन में आ रहा है बारम्बार व्रत ,साजोशृंगार क्या था सब दिखावा ?
बेबकूफी ,मजबूरी ,संस्कार ,या था एक आडंबर जो हमने कल था आँखों से देखा
--रोशी
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रविवार, 9 अक्टूबर 2022

 सुनो इन्द्र देवता अब आपातकाल स्थिति आन पड़ी है भारी

रोक लो अब मेघों का कहर ,बिपदा आन पड़ी है अत्यंत भारी
गाँव ,देहात में छाया विकट कहर ,खेत ,खलिहान सब जलमग्न
घर -छप्पर गिर रहे टूटकर ,मजबूर हुए सब गरीब इंसान
खाने के पड़ गए लाले ,बह गया गृहस्थी का सब सामान
बीमारियो ने है पाँव पसारे ,हर जन है हैरान -परेशान
तकलीफ में है हमारा अन्नदाता ,जीवन उसका हुआ गमगीन
गुजर जाएगा है तकलीफ देह वक़्त पर छोड़ जाएगा गहरे जख्म
जीवन में जब आ जाती है अचानक आपदा ,समझा जाती जीने का मर्म
--रोशी

शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

 मौसम की अतिवृष्टि ने त्योहारों का मज़ा फीका कर दिया था जिसका पूरे वर्ष शिद्दत से इंतज़ार

किसान जो अपनी गन्ने ,धान की फसल और कमाई का कर रहा था इंतज़ार
सारे ख्वाब हूए चकनाचूर उसके ,खाने को दाना नहीं ,जेब में पैसा नहीं सब बह गया पानी में
कुम्हार जिसने महीनो जतन से बनाए थे दीपक ,खिलौने सब के सब घुल गए पानी में
सारा परिश्रम गया व्यर्थ ,बच्चों के सुनहले सपने सभी बह गए इस बेमौसमी बरसात में
जब हमारे अन्नदाता ,मजदूर बर्ग बेहाल तो बताओ कैसे मनेगा दीवाली का त्योहार ?
पटाखे ,झालरें ,दीपक बनाने वालों पर टूटा है बारिश का कहर ,खुशी से ना मनेगा सबका त्योहार
श्रमिक वर्ग बैठा घर पर खाली ,पानी ने मचा दी चहुं ओर तबाही वो खाली हुआ बेरोजगार
बाज़ार हूए खाली ,छाई है बे-रौनकी हर ओर बस दिखता है पानी ही पानी चहुं ओर
यही करते है अर्ज़ रब से कि रोक दो अति व्रष्टि , बरसाना बंद कर दो अब पानी
जरूरत है ना अब इसकी, त्रस्त हुए जन- मानस बस रोक लो अब बरसाना पानी
--रोशी
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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022

 बाज़ारों के रौनक दे रही संकेत दीपावली के आगमन का

हर तरफ है अफरा -तफरी फैली सफाई घर -दुकान सजाने का
व्यस्त है हर कोई खुद को बेहतर दिखाने में ,खुद को सजाने में
महिलाएं हैं मशरूफ़ खुद को निखारने में ,पुरुष हुए मस्त जुएखाने में
हो गए हैं शुरू दावतों के दौर ,व्यस्त हुये सब खाने और पीने -पिलाने में
लगा रहे हैसियत से बड़कर ताश की बाज़ी ,तनिक भी ना है ध्यान परिवार में
त्योहार की खुमारी छाई सब पर ,व्यस्त हैं सभी अपने -अपने तरीकों में
तरीके हैं मनाने के अलग -अलग पर सराबोर हैं सभी खुशियों के रंग में
--रोशी
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  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...