शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

 मौसम की अतिवृष्टि ने त्योहारों का मज़ा फीका कर दिया था जिसका पूरे वर्ष शिद्दत से इंतज़ार

किसान जो अपनी गन्ने ,धान की फसल और कमाई का कर रहा था इंतज़ार
सारे ख्वाब हूए चकनाचूर उसके ,खाने को दाना नहीं ,जेब में पैसा नहीं सब बह गया पानी में
कुम्हार जिसने महीनो जतन से बनाए थे दीपक ,खिलौने सब के सब घुल गए पानी में
सारा परिश्रम गया व्यर्थ ,बच्चों के सुनहले सपने सभी बह गए इस बेमौसमी बरसात में
जब हमारे अन्नदाता ,मजदूर बर्ग बेहाल तो बताओ कैसे मनेगा दीवाली का त्योहार ?
पटाखे ,झालरें ,दीपक बनाने वालों पर टूटा है बारिश का कहर ,खुशी से ना मनेगा सबका त्योहार
श्रमिक वर्ग बैठा घर पर खाली ,पानी ने मचा दी चहुं ओर तबाही वो खाली हुआ बेरोजगार
बाज़ार हूए खाली ,छाई है बे-रौनकी हर ओर बस दिखता है पानी ही पानी चहुं ओर
यही करते है अर्ज़ रब से कि रोक दो अति व्रष्टि , बरसाना बंद कर दो अब पानी
जरूरत है ना अब इसकी, त्रस्त हुए जन- मानस बस रोक लो अब बरसाना पानी
--रोशी
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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022

 बाज़ारों के रौनक दे रही संकेत दीपावली के आगमन का

हर तरफ है अफरा -तफरी फैली सफाई घर -दुकान सजाने का
व्यस्त है हर कोई खुद को बेहतर दिखाने में ,खुद को सजाने में
महिलाएं हैं मशरूफ़ खुद को निखारने में ,पुरुष हुए मस्त जुएखाने में
हो गए हैं शुरू दावतों के दौर ,व्यस्त हुये सब खाने और पीने -पिलाने में
लगा रहे हैसियत से बड़कर ताश की बाज़ी ,तनिक भी ना है ध्यान परिवार में
त्योहार की खुमारी छाई सब पर ,व्यस्त हैं सभी अपने -अपने तरीकों में
तरीके हैं मनाने के अलग -अलग पर सराबोर हैं सभी खुशियों के रंग में
--रोशी
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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2022

 राम और कृष्ण ईश्वरीय अवतार थे ,संसार में अधर्म का नाश था जरूरी

विश्व को बड़ते पाप पर संयम ,धर्म ,सदाचार का पाठ पड़ाना था जरूरी
क्या राम को ना पता था माता सीता का ठिकाना? ,पर वन में पूछना था जरूरी
कृष्ण कंस का वध करने में थे पूर्ण सक्षम ,पर सही वक़्त की प्रतीक्षा करना था उनको जरूरी
14 वर्ष का वनवास ,सीता का हरण ,वन में ढेरों कष्ट ,जगत को बोध कराना था जरूरी
महाभारत को रोकने में सक्षम थे पूड़तया माधव पर, गीता का ज्ञान विश्व को देना था बहुत जरूरी
सही वक़्त पर सही फैसला बदल देता है जीवन की दिशा ,गर की होती जल्दबाज़ी राम और कृष्ण ने निज जीवन में
वंचित रह जाती दुनिया राम चरित मानस और गीता के ज्ञान से ,ना होते कोई आदर्श हमारे पास जीवन में
--रोशी

रविवार, 2 अक्टूबर 2022

 गरबे का खुमार और संगीत का बुखार छाया हुआ है फिजा में

स्त्रियाँ लहंगा -चोली में ,पुरुष हैं दिखते पारंपरिक परिधानों में
डांडिया का है शोर विभिन्न वस्त्रों के प्रदर्शन पर है पूरा ज़ोर
अपनी डांस प्रतिभा को आजमाने का है मचा जबर्दस्त शोर
अपनी -अपनी श्रेस्ठ्ता,प्रतिभा को लगे है सब प्रदर्शित करने में
सास -बहू भी ना रहती पीछे एक दूजे को डांडिया में नीचा दिखाने में
गरबा तो बनता जा रहा है एक राष्ट्रीय पर्व सम्पूर्ण राष्ट्र में चहुं ओर
इंतज़ार रहता सांझ का ,बस गूँजता पंडाल ढ़ोल -नगाड़े से हर ओर
होता था पहले सिर्फ गुजरात में गरबा अब जड़ें फ़ैल गईं हैं इसकी सर्वत्र
युवा पीड़ी थिरके इसके मधुर संगीत पर ,बच्चे ,बूड़े सभी नाचें हो के मदमस्त
--रोशी
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शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

 ज़िंदगी का हर गुजरता लम्हा ,वापस नहीं आता उसका आनंद उठाओ

जैसे जीना चाहो खुल के जियो ,जितनी साँसे है उनका पूरा लुफ्त उठाओ
मन का खाओ-पीयो,जो दिल चाहे पहनो ,खुद के लिए भी जीना सीख जाओ
देश -विदेश की सैर करो ,बड्ते कदमों को ना रोको ,सारा जग घूम डालो
ज़िंदगी और सेहत मिली है बेशकीमती जी भरकर उसका लुफ्त उठा डालो
हर गुजरता लम्हा है नए दौर में मुश्किल खुद का जीवन आसान बना लो
परिवार के साथ गुफ्तगू ,दोस्तों से जी भर दिल्लगी आज ही कर डालो
जो ठाना हो करने का आज से ही मकसद को अंजाम तक पहुंचा डालो
दिल ,दिमाग जो कहे करने को नेक विचार पर अमल आज ही कर डालो
जीवन की घड़ियाँ रेत की मानिद फिसल रहीं हर घड़ी जो जी चाहे कर डालो
ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा ,कथन को दिल ,दिमाग में बैठा डालो ,बैठा डालो
--रोशी
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गुरुवार, 29 सितंबर 2022

 चाट के ठेले के पास देखे दो बालक चुपचाप ,लालच भरी निगाह से खड़े

निस्तेज चेहरा ,जीर्ण -शीर्ण काया,धूल -मिट्टी से अटे ,कुछ पाने की इच्छा से खड़े
दयनीय भाव से भीख मांगते ,शायद भूखे भी थे दिखते ,उम्मीद से कुछ पाने की
बार -बार करते थे गुजारिश , पैसे दे दो खाना नहीं मिला, गुजारिश थी पैसों की
हमने कहा पैसे नहीं कुछ खिला देते हैं ,तत्काल थे वो लपके ठेले पर सब खाने को
क्या खाओगे ?यों देखा मानो आतुर थे वो मिनटों मे समूचा ठेला खाने को
पल भर में खत्म किया खाना ,देख उनको दो अश्रु हमारी भी आँख से टपके
भूख क्या होती है ?,भोजन की अहमियत का ना था एहसास हुआ हमको कभी
आज था जाना अपनी भरी थाली का मोल ,जब जेब में ना हो पास टका कभी
अन्न का दाना है कितना बेशकीमती ,जब थाली सिर्फ दूर से देखनी हो कभी
शुक्र अदा करो उस ईश्वर का जिसने अता की इतनी नेमते ,जानकर आपको खास
बेशकीमती है यह भोजन की थाली, जिसको है ना मयस्सर ,पूछो उससे आज .....
--रोशी
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 बुराई पर अच्छाई की जीत जग विदित है

दशहरे पर रावण का दहन भी सदेव से निश्चित है
इतने ज्ञानी ,ध्यानी रावण ने क्यों किया घिनौना कर्म ?
हो गया समस्त वंश का नाश ,अगर ना किया होता ऐसा अधर्म
पुत्र ,भाई, पत्नी सबने था उसको रोका ,पर विधना ने तो लिख रखा था कुछ और
स्वर्ण-जड़ित लंका हो गयी खाक गर किया होता सबकी बातों पर रावण ने गौर
महान योद्धा ,परम ज्ञानी ,महान शक्तिशाली पुरशो में नाम दर्ज़ होता इतिहास में
सीता ,विभीषण ,हनुमान के साथ गर ना किया होता अत्याचार अपने राज्य में
विधना ने तो लिखा था रावण के भाग्य में कि लंका मिल जाएगी पलों में खाक में
गर सुनी होती अपनों की ,ना होता यों दहन हर वर्ष ,नाम होता दर्ज़ इतिहास में
--रोशी
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