आंगन गुलज़ार रहता था उनकी भागादौड़ी ,शैतानियों से
आगे -पीछे दौड़ते ,कब दिन ढल जाता इतनी शीघ्रता से
बदलाव होता बहुत जरूरी जिन्दगी के रोज़मर्रा ढर्रे से
जिन्दगी में रंग भर जाते नए कुछ वक़्त अपनों के साथ गुजारने से
--रोशी
जिन्दगी बहुत बेशकीमती है ,उसका भरपूर लुफ्त उठाओ कल का पता नहीं तो आज ही क्योँ ना भरपूर दिल से जी लो जिन्दगी एक जुआ बन कर रह गयी है हर दिन ...
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